Thursday, 18 April 2019

" श्रीबांके बिहारी जी "

" II जय श्री राधे II "


बहुत समय पहले की बात है  
वृन्दावन में श्रीबांके बिहारी जी के मंदिर में रोज
पुजारी जी बड़े भाव से सेवा करते थे। 

वे रोज बिहारी जी की आरती करते , भोग
लगाते और उन्हें शयन कराते और रोज चार लड्डू
भगवान के बिस्तर के पास रख देते थे। उनका यह भाव
था कि बिहारी जी को यदि रात में भूख
लगेगी तो वे उठ कर खा लेंगे। और जब वे सुबह मंदिर के पट खोलते थे
तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था।
इसी भाव से वे रोज ऐसा करते थे।

एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद
वे चार लड्डू रखना भूल गए। उन्होंने पट बंद किए और चले
गए। रात में करीब एक-दो बजे , जिस दुकान से वे
बूंदी के लड्डू आते थे , उन बाबा की दुकान
खुली थी। वे घर जाने ही वाले थे तभी एक छोटा सा बालक
आया और बोला बाबा मुझे बूंदी के लड्डू चाहिए।

बाबा ने कहा - लाला लड्डू तो सारे ख़त्म हो गए। अब
तो मैं दुकान बंद करने जा रहा हूँ। वह बोला आप अंदर
जाकर देखो आपके पास चार लड्डू रखे हैं। उसके हठ
करने पर बाबा ने अंदर जाकर देखा तो उन्हें चार लड्डू
मिल गए क्यों कि वे आज मंदिर नहीं गए थे। बाबा ने
कहा - पैसे दो।

बालक ने कहा - मेरे पास पैसे तो नहीं हैं और तुरंत
अपने हाथ से सोने का कंगन उतारा और बाबा को देने
लगे। तो बाबा ने कहा - लाला पैसे नहीं हैं तो रहने दो,
कल अपने बाबा से कह देना , मैं उनसे ले लूँगा। पर वह
बालक नहीं माना और कंगन दुकान में फैंक कर भाग
गया। 

सुबह जब पुजारी जी ने पट खोला तो उन्होंने देखा
कि बिहारी जी के हाथ में कंगन नहीं है। यदि चोर भी
चुराता तो केवल कंगन ही क्यों चुराता। 

थोड़ी देर बाद ये बात सारे मंदिर में फ़ैल गई।
जब उस दुकान वाले को पता चला तो उसे रात की बात
याद आई। उसने अपनी दुकान में कंगन ढूंढा और
पुजारी जी को दिखाया और सारी बात सुनाई। तब
पुजारी जी को याद आया कि रात में , मैं लड्डू रखना ही भूल गया
था। इसलिए बिहारी जी स्वयं लड्डू लेने गए थे।

यदि भक्ति में भक्त कोई सेवा भूल भी जाता है तो
भगवान अपनी तरफ से पूरा कर लेते हैं।

🥀⚘ जय श्री राधे ⚘🥀



(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Friday, 12 April 2019

"आइए हनुमंत जी बिराजिए"

एक साधु महाराज श्री रामायण कथा सुना रहे थे। लोग आते और आनंद विभोर होकर जाते। साधु महाराज का नियम था रोज कथा शुरू करने से पहले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहकर हनुमान जी का आह्वान करते थे, फिर एक घण्टा प्रवचन करते थे। एक वकील साहब हर रोज कथा सुनने आते। वकील साहब के भक्तिभाव पर एक दिन तर्कशीलता हावी हो गई। उन्हें लगा कि महाराज रोज "आइए हनुमंत जी बिराजिए" कहते हैं तो क्या हनुमान जी सचमुच आते होंगे! अत: वकील साहब ने महात्मा जी से पूछ ही डाला- महाराज जी, आप रामायण की कथा बहुत अच्छी कहते हैं। हमें बड़ा रस आता है परंतु आप जो गद्दी प्रतिदिन हनुमान जी को देते हैं उसपर क्या हनुमान जी सचमुच बिराजते हैं? साधु महाराज ने कहा… हाँ यह मेरा व्यक्तिगत विश्वास है कि रामकथा हो रही हो तो हनुमान जी अवश्य पधारते हैं। वकील ने कहा… महाराज ऐसे बात नहीं बनेगी। हनुमान जी यहां आते हैं इसका कोई सबूत दीजिए । आपको साबित करके दिखाना चाहिए कि हनुमान जी आपकी कथा सुनने आते हैं। महाराज जी ने बहुत समझाया कि भैया आस्था को किसी सबूत की कसौटी पर नहीं कसना चाहिए यह तो भक्त और भगवान के बीच का प्रेमरस है, व्यक्तिगत श्रद्घा का विषय है । आप कहो तो मैं प्रवचन करना बंद कर दूँ या आप कथा में आना छोड़ दो। लेकिन वकील नहीं माना, वो कहता ही रहा कि आप कई दिनों से दावा करते आ रहे हैं। यह बात और स्थानों पर भी कहते होंगे,इसलिए महाराज आपको तो साबित करना होगा कि हनुमान जी कथा सुनने आते हैं। इस तरह दोनों के बीच वाद-विवाद होता रहा। मौखिक संघर्ष बढ़ता चला गया। हारकर साधु महाराज ने कहा… हनुमान जी हैं या नहीं उसका सबूत कल दिलाऊंगा। कल कथा शुरू हो तब प्रयोग करूंगा। जिस गद्दी पर मैं हनुमानजी को विराजित होने को कहता हूं आप उस गद्दी को आज अपने घर ले जाना। कल अपने साथ उस गद्दी को लेकर आना और फिर मैं कल गद्दी यहाँ रखूंगा। मैं कथा से पहले हनुमानजी को बुलाऊंगा, फिर आप गद्दी ऊँची उठाना। यदि आपने गद्दी ऊँची कर दी तो समझना कि हनुमान जी नहीं हैं। वकील इस कसौटी के लिए तैयार हो गया। महाराज ने कहा… हम दोनों में से जो पराजित होगा वह क्या करेगा, इसका निर्णय भी कर लें ?.... यह तो सत्य की परीक्षा है। वकील ने कहा- मैं गद्दी ऊँची न कर सका तो वकालत छोड़कर आपसे दीक्षा ले लूंगा। आप पराजित हो गए तो क्या करोगे? साधु ने कहा… मैं कथावाचन छोड़कर आपके ऑफिस का चपरासी बन जाऊंगा। अगले दिन कथा पंडाल में भारी भीड़ हुई जो लोग रोजाना कथा सुनने नहीं आते थे,वे भी भक्ति, प्रेम और विश्वास की परीक्षा देखने आए। काफी भीड़ हो गई। पंडाल भर गया। श्रद्घा और विश्वास का प्रश्न जो था। साधु महाराज और वकील साहब कथा पंडाल में पधारे... गद्दी रखी गई। महात्मा जी ने सजल नेत्रों से मंगलाचरण किया और फिर बोले "आइए हनुमंत जी बिराजिए" ऐसा बोलते ही साधु महाराज के नेत्र सजल हो उठे । मन ही मन साधु बोले… प्रभु ! आज मेरा प्रश्न नहीं बल्कि रघुकुल रीति की पंरपरा का सवाल है। मैं तो एक साधारण जन हूँ। मेरी भक्ति और आस्था की लाज रखना। फिर वकील साहब को निमंत्रण दिया गया आइए गद्दी ऊँची कीजिए। लोगों की आँखे जम गईं । वकील साहब खड़ेे हुए। उन्होंने गद्दी उठाने के लिए हाथ बढ़ाया पर गद्दी को स्पर्श भी न कर सके ! जो भी कारण रहा, उन्होंने तीन बार हाथ बढ़ाया, किन्तु तीनों बार असफल रहे। महात्मा जी देख रहे थे, गद्दी को पकड़ना तो दूर वकील साहब गद्दी को छू भी न सके। तीनों बार वकील साहब पसीने से तर-बतर हो गए। वकील साहब साधु महाराज के चरणों में गिर पड़े और बोले महाराज गद्दी उठाना तो दूर, मुझे नहीं मालूम कि क्यों मेरा हाथ भी गद्दी तक नहीं पहुंच पा रहा है। अत: मैं अपनी हार स्वीकार करता हूं। कहते है कि श्रद्घा और भक्ति के साथ की गई आराधना में बहुत शक्ति होती है। मानो तो देव नहीं तो पत्थर। प्रभु की मूर्ति तो पाषाण की ही होती है लेकिन भक्त के भाव से उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है तो प्रभु बिराजते है।


🙏🙏जय श्री राम🙏🙏




(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Saturday, 6 April 2019

" II जय श्री राधे II "


प्रेम शब्द ही अपने आप में परिपूर्ण हैं | प्रेम सोच समझकर नही किया जा सकता हैं | ये एक खुबसूरत एहसास हैं | इस प्रेम के साथ जीना बहुत बड़ी बात हैं | आश्चर्य की बात हैं प्रेम का एहसास कम लोगो को होता हैं | कुछ लोग कहते हें की, “हम उनके बिना नही जी सकते” ये जरूरी नही प्रेम ही हैं; ये आदत भी हो सकती हैं | ज्यादातर लोग अपनी इसी आदत को ही प्रेम समझकर बैठे हैं | प्रेम की अभिव्यक्ति बाहर से जरूर आती हैं पर प्रेम हमारे अंदर से ही आता हैं | प्रेम एक बहुत खुबसूरत एहसास हैं जिसे शब्दों में व्यक्त नही किया जा सकता हैं केवल उसे अनुभव किया जा सकता हैं |
प्रेम जिंदगी का अभिन्न अंग हैं | प्रेम के साथ अभिन्नता भी होनी चाहिये | सच्चा प्रेम हमें जीने की शक्ति देता हैं | प्रेम के स्वरुप अलग-अलग हैं | भक्ति भी प्रेम का ही स्वरुप हैं |

रामकृष्ण परमहंस ने माँ काली के साथ अभिन्न प्रेम किया था | वो हमेशा माँ काली की भक्ति प्रेम में डूबे रहते थे | वे रोज रात को  जंगल जाया करते थे, उनका एक शिष्य यह देखता था | उसमें उत्सुकता जाग उठी की मेरे गुरु रोज रात में कहाँ जाते हैं | एक रात जब रामकृष्ण परमहंस रोज की रोज की भांति जंगल के लिय निकले, उनका वह शिष्य भी उनके पीछे-पीछे चुपचाप चला आया | उसने वहां जंगल में देखा की उसके गुरु निर्वस्त्र माँ काली के भजन में नाच रहे थे | उसे लगा उसके गुरु पागल हो गए हैं | उस वक्त रामकृष्ण परमहंस माँ काली के भक्ति प्रेम में डूबे हुए थे, वे माँ काली के साथ अभिन्न थे | उन्होंने प्रेम में माँ काली के साथ अभिन्नता पा ली थी |

जहाँ प्रेमभाव होता हैं वहाँ भौतिक अड़चने अपने आप दूर होने लगती हैं | प्रेम में कमी, खामियां, दूरियां ख़त्म होने लगती हैं | प्रेम में एकदूसरे पर अधिकार जताना नहीं हैं, यह प्रेम का निम्न स्तर का हैं | जहाँ स्वार्थ होता हैं वहां प्रेम नही वासना होती हैं | प्रेम तो एक होने की अनुभूति हैं | इसमें अधिकार या वर्चस्व नही हैं |

प्रेम एक होने का अनुभव हैं | जहाँ एकत्व का अनुभव आता हैं वहाँ यादों के सहारे की जरूरत भी नही होती हैं | यादें तभी होती हैं जहाँ प्रेम में कुछ कमी हो |
एकत्व का सबसे बड़ा उदाहरण राधा-कृष्ण, कृष्ण-मीरा के प्रेम में देखा जा सकता हैं | राधा ने कृष्ण से बड़े प्रेम से कहा “हें कृष्ण! ये तुम्हारी कैसी पहचान हैं, जहाँ तुम्हारे नाम से पहले मेरा नाम आता हैं | यह प्रेम की सबसे उच्च अभिव्यक्ति हैं जो स्वार्थ और शरीर से उपर हैं| इस प्रेम में दो शरीर नही आत्मा का प्रेम हैं |

कृष्ण-मीरा 

मीरा एक साधारण नारी होते हुए भी प्रेम को उच्चतम स्तर पर पहुँचा सकी | पत्थर की मूर्ति को उसने प्रेम की मूर्ति बना दिया | उसके प्रेम-प्रस्ताव को भगवान कृष्ण भी नही ठुकरा सके | यह प्रेम की उच्चतम ऊंचाई हैं | राधा-कृष्ण के प्रेम में , प्रेम की गहराई हैं, जबकि प्रेम की अनुभूति की ऊंचाई कृष्ण को मीरा के पास खीचकर लाई | पर राधा-कृष्ण के प्रेम में गहराई थी | वो दो आत्माओं की अनुभूति  थी | राधा-कृष्ण तथा मीरा-कृष्ण दोनों की प्रेम-तरंगे ( Vibration)अलग हैं| प्रेम दोनों का पवित्र हैं, प्रेम एक पवित्र रिश्ता हैं | इसमें वासना का स्थान नहीं हैं |

रामकृष्ण परमहंस के प्रेम में भक्तिरस हैं | वे माँ काली के साथ भक्तिप्रेम से अभिन्न थे | प्रेम के स्वरुप अलग-अलग हें पर परिभाषा एक हैं | प्रेम का अस्तिव अखंड हैं | प्रेम अपने आप में  पूर्ण हैं | इसके एहसास में कमतरता नहीं होती | प्रेम में उच्च तरंगे काम करती हैं | ये तरंगे हमें ध्यान से प्राप्त होती हैं | ध्यान के बिना हम तरंगे भेज नही सकते हैं | राधा हमेशा कृष्ण के ध्यान में रहती थी | तभी उसकी तरंगे कृष्ण को प्राप्त होती थी |

हर रिश्ता या बंधन प्रेम से पूर्ण होता हैं | उसे हमें महसूस करना हैं | ईश्वर ने हर इंसान को यह क्षमता दी  हैं की वह  प्रेम को महसूस कर सके | दिया खुद को जब तक जलाता नही तबतक शंमा उसके प्रेम को महसूस नही करती  |

ये प्रेम समझने के लिय पूरी जिन्दगी कम पड़ जाती हैं | ईश्वर चाहता हें की मनुष्य अपने इंसानी प्रेम को इस स्तर पर ला सके की वह अपनी चेतना को परम चेतना में मिला सके, जो की जीवन का परम उदेश्य हैं |

जब आप प्रेम में अपने आप को मिटा देते हैं तो ही सही मायने में आप प्रेम को उपलब्ध हो पाते हैं | गहराई से देखा जाये जाये तो प्रेम और कुछ और नही बल्कि ध्यान का ही एक रूप हैं क्योंकि जब हम ध्यान में अपने आप को मिटा देते हें तभी हम परमात्मा को उपलब्ध हो पाते हैं | बात एक ही हैं हर जीव परमात्मा का ही अंश हैं, और जब प्रेम अपने उच्च स्तर पर पहुँचता हैं तब आप अपने प्रेमी में ही अपने परमात्मा को पाते हैं | ईश्वर ही प्रेम हैं और प्रेम ही ईश्वर हैं |

🥀⚘ जय श्री राधे ⚘🥀



(Courtesy - श्री हरि मंदिर चण्डीगढ )

" मर्यादा पुरुषोत्तम राम - शबरी संवाद "


एकटक देर तक उस सुपुरुष को निहारते रहने के बाद बुजुर्ग भीलनी के मुंह से बोल फूटे- कहो राम! सबरी की डीह ढूंढ़ने में अधिक कष्ट तो नहीं हुआ?
राम मुस्कुराए- यहां तो आना ही था मां, कष्ट का क्या मूल्य...

"जानते हो राम  ! तुम्हारी प्रतीक्षा तब से कर रही हूँ जब तुम जन्में भी नहीं थे। यह भी नहीं जानती थी कि तुम कौन हो ? कैसे दिखते हो ? क्यों आओगे मेरे पास..? बस इतना ज्ञात था कि कोई पुरुषोत्तम आएगा जो मेरी प्रतीक्षा का अंत करेगा..."

राम ने कहा- "तभी तो मेरे जन्म के पूर्व ही तय हो चुका था कि राम को सबरी के आश्रम में जाना है।"

"एक बात बताऊँ प्रभु ! भक्ति के दो भाव होते हैं। पहला मर्कट भाव, और दूसरा मार्जार भाव। बन्दर का बच्चा अपनी पूरी शक्ति लगाकर अपनी माँ का पेट पकड़े रहता है ताकि गिरे न... उसे सबसे अधिक भरोसा माँ पर ही होता है और वह उसे पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। यही भक्ति का भी एक भाव है, जिसमें भक्त अपने ईश्वर को पूरी शक्ति से पकड़े रहता है। दिन रात उसकी आराधना करता है। 
पर मैंने यह भाव नहीं अपनाया। मैं तो उस बिल्ली के बच्चे की भाँति थी जो अपनी माँ को पकड़ता ही नहीं, बल्कि निश्चिन्त बैठा रहता है कि माँ है न, वह स्वयं ही मेरी रक्षा करेगी। और माँ सचमुच उसे अपने मुँह में टांग कर घूमती है... मैं भी निश्चिन्त थी कि तुम आओगे ही, तुम्हे क्या पकड़ना...।"

राम मुस्कुरा कर रह गए। भीलनी ने पुनः कहा - "सोच रही हूँ बुराई में भी तनिक अच्छाई छिपी होती है न... कहाँ सुदूर उत्तर के तुम, कहाँ घोर दक्षिण में मैं । तुम प्रतिष्ठित रघुकुल के भविष्य, मैं वन की भीलनी... यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो तुम कहाँ से आते ?"

राम गम्भीर हुए। कहा, "भ्रम में न पड़ो मां ! राम क्या रावण का वध करने आया है ? छी... अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से बाण चला कर कर सकता है। राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है मां, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई पाखण्डी भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था। 

जब कोई कपटी भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं ! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है। 

राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है। राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतीक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं। राम रावण को मारने भर के लिए नहीं आया मां..."

सबरी एकटक राम को निहारती रहीं। राम ने फिर कहा- " राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता ! राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए। राम निकला है ताकि विश्व को बता सके कि माँ की अवांछनीय इच्छओं को भी पूरा करना ही 'राम' होना है। राम निकला है कि ताकि भारत को सीख दे सके कि किसी सीता के अपमान का दण्ड असभ्य रावण के पूरे साम्राज्य के विध्वंस से पूरा होता है। 

राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है, राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणों का घमंड तोड़ा जाय। 

और राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं ।"

सबरी की आँखों में जल भर आया था। उसने बात बदलकर कहा- "बेर खाओगे राम?

राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं मां..."

सबरी अपनी कुटिया से झपोली में बेर ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया। राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- "मीठे हैं न प्रभु?"

यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ मां! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है...।

सबरी मुस्कुराईं, बोलीं- "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो राम! गुरुदेव ने ठीक कहा था...।"

🙏🌹 ।। जै श्रीराम ।। 🙏🌹 





(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

"पालनहारा मोर मुकुट मुरलीवाला"

🙏🌹 जै श्रीकृष्ण  🌹🙏

हर समय कण्ठी माला लेकर बैठे रहते हो । कभी कुछ दो पैसे का इंतजाम करो लड़की के लिए लड़का नहीं देखना। आज फिर निर्मला ने रोज की तरह सुबह से ही बड़बड़ाना शुरु कर दिया।

अरे भाग्यवान ईश्वर पर विश्वास रखो , समय पर सब हो जाएगा । चौबे जी ने अपना गमछा संभालते हुए कहा।

इन चरणों में जो भी आये, 
उसका जन्म सफल हो जाये। 

हाँ हाँ ईश्वर तो जैसे घर बैठे ही लड़का भेज देंगे। भगवान के पास तो कोई काम है नहीं सिर्फ आपका ध्यान रखने के अलावा ।

अरे क्यों पूरा दिन चकचक करती रहती हो ? बैसे चौबेजी कभी गुस्सा नहीं होते। वो तो बिमारी के चलते नोकरी छोड दी थी। अब बस पूरा दिन बस गोपालजी की सेवा करते और उन्ही के बारे में ही सोचते हैं ।

निर्मला बोली जयपुर वाली मौसी बता रही थी , उनके रिश्तेदारी में एक लड़का है । पर देखने तो जब आओगे , 

जब जेब में 1000-2000 रुपए होंगे । जो दस बीस रुपए बचते हैं ,उन्हें भी अपने दोस्तों को उधार दे देते हो। आज तक लौटाए हैं किसी दोस्त ने।

पर आज तक कभी किसी चीज की कोई कमी हुई है । नहीं ना, आगे भी नहीं होगी ईश्वर की कृपा से।
तुम तो मुझे भजन भी नहीं करने देती ।

भजन ही करना था तो शादी क्यों की ? अब क्या वो बैठे-बिठाए तुम्हारी लड़की की शादी भी कर जाएंगे।

हाँ रहने दो बस । यह लो थैला पकड़ो और जाओ बाजार से रसोई के लिए सामान ले आओ और हां , जिस लडके के बारे में मैंने बात की है । उसके बारे में जरा सोचना परसों जाना है तुम्हें। अब थोड़े बहुत पैसों  के लिए हम एफडी तो तुडवाओगे नहीं सो जो यार दोस्तों को उधार दे रखे हैं उनसे जरा मांग लो।

थैला लेकर चौबेजी निकल तो गए लेकिन विचार यही है मन में। पैसों का इंतजाम कैसे होगा ? सब्जी लेने से पहले जरा अपने एक दोस्त से अपने पैसों की बात कर ली जाए । जिस दुकान में काम करता है , वो भी पास ही है ।

मोहनलाल ने अपने मित्र को देखा तो गले लगा लिया । अरे चौबेजी कैसे आना हुआ ? कुछ ना  भैया कुछ समस्या आन पड़ी है । पैसो की सख्त जरुरत है ? अपने ही पैसे चौबेजी ऐसे मांग रहे हैं , जैसे उधार मांग रहे हो।

देखता हूँ साहब तो बिमार है चार दिन पहले ही दिल का दौरा पड़ा था। अभी दस दिन पहले ही विदेश से आए हैं। बैसे तो ऐसे 6 शोरूम है उनके पास। पर चलो एक दो दिन में आएंगे तो मांग करके तुम्हें दे दूंगा। 

और बताओ बिटिया ठीक है ? कैसा चल रहा है उसका  योगा क्लास ?

बढ़िया चल रहा है सुबह 5:00 बजे जाती है ,पूरा 5000 कमाती है। चौबेजी ने बड़े गर्व से कहा। 

सर्वगुण संपन्न है जी हमारी लाली। कैबिन से बाहर  निकले ही थे , एक जगह नज़र टिकी गई। इतनी सुंदर मूर्ति गोपाल की। चौबे जी अपलक देख रहे थे जैसे अभी बात करने लगेगी।
तभी मोहनलाल ने ध्यान भंग करते हुए कहा ," बडे साहब ने आर्डर पर बनवाई है। बाहर से बनकर आई है । ऐसी दो बनवाई हैं ।"

रास्ते भर मूर्ति की छवि   उनकी नजरों से ओझल नहीं हो रही थी । काश वो मूर्ति उनके पास होती। भूल नहीं पा रहे  हैं  काश अगर उनके पास होती कैसे दिनभर निहारते रहते , क्या क्या सेवा करते सोचते सोचते ,घर कब आया पता ही नहीं चला।

लेकिन घर के सामने इतनी भीड़ क्यों है ? यह गाड़ी किसकी गाड़ी तो काफी महंगी लग रही है ? अपने घर के दरवाजे में घुसने ही वाले थे कि थैला हाथ से छीनकर निर्मला ने मुस्कुराकर उनका  स्वागत किया। 

 कौन आया है ? अंदर सूट बूट में एक आदमी बैठा है। चौबेजी को  देखते ही वो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

 राधे राधे चौबे जी ने कहा। बैठिए पर क्षमा कीजिए  मैंने आपको पहचाना नहीं।

 अरे आप कैसे पहचानेंगे ? हम पहली बार मिल रहे हैं । उसने बड़ी शालीनता के साथ जवाब दिया।
                    
जी कहिए , मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ? 

 दरअसल मैं आपसे कुछ मांगने आया हूँ । 

 सीधा-सीधा बताइए चौबे जी सोच में  पडे थे जाने वह क्या मांग ले?
और इतने बड़े आदमी को मुझसे क्या चाहिए ?

आज से चार दिन पहले मैं सुबह की सैर के लिए गया था। लेकिन उस दिन मेरे साथ एक दुर्घटना हुई। अचानक मुझे हार्टअटैक आ गया। आसपास  कोई नहीं था मदद के लिए। ना मैं कुछ बोल पा रहा था । तभी एक लड़की स्कूटी पर आती दिखी। मुझे सडक पर पड़े हुए देखकर उसने अपनी स्कूटी रोकी।

अकेली वो मुझे उठा नहीं सकती थी। फिर अपनी स्कूटी से दूर से दुकान पर जाकर एक आदमी को बुलाकर लाई । उसकी मदद से उसने मुझे अपनी स्कूटी पर बिठाया और मुझे हॉस्पिटल लेकर गई। अगर थोड़ी सी भी देर हो जाती शायद मेरा अन्त निश्चित था। और वो लड़की कोई और नहीं , आपकी बेटी थी।

उस आदमी ने हाथ जोड़ते हुए कहा , अगर आप लायक समझे ,
तो मैं अपने बेटे के लिए आपकी बेटी का हाथ मांगता हूं । ओर जो अनजान की मदद कर सकती है । वो अपने परिवार का कितना ध्यान रखेगी।"

चौबेजी एक दम जड़ हो गए । वह विश्वास नहीं कर पा रहे थे,
हे ईश्वर क्या यह सब सच में ये हो रहा है कि मुझे किसी के दरवाजे पर ना जाना पड़े। इस स्थिति से बाहर निकले भी नहीं थे कि

तभी उन्होंने अपने पास रखे हुए बैग में से एक बाक्स निकाला।
उन्हें देते हुए कहा कि शगुन का एक छोटा सा उपहार है।
मना मत करना.. चौबेजी ने खोलते हुए देखा 
इसमें वही बालगोपाल की मूर्ति थी , जिसे अभी शोरूम में देखकर आए थे। जो आंखो के सामने से ओझल नहीं हो रही थी । जिसे देखते ही मन में ये ख्याल आयाथा कि काश मेरे मंदिर में होती ।

आज ऊपरवाले ने प्रमाणित  कर दिया की मुझे उसका जितना ख्याल है उससे कहीं ज्यादा उसे मेरा ख्याल है ।

*बोलो राधे राधे*

🙏🌹 ।। राधे राधे।।  🌹🙏


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Sunday, 3 February 2019

🌷 *सबसे ऊँची प्रार्थना* 🌷

*एक व्यक्ति जो मृत्यु के करीब था, मृत्यु से पहले अपने बेटे को चाँदी के सिक्कों से भरा थैला देता है और बताता है की "जब भी इस थैले से चाँदी के सिक्के खत्म हो जाएँ तो मैं तुम्हें एक प्रार्थना बताता हूँ, उसे दोहराने से चाँदी के सिक्के फिर से भरने लग जाएँगे ।

*उसने बेटे के कान में चार शब्दों की प्रार्थना कही और वह मर गया । अब बेटा चाँदी के सिक्कों से भरा थैला पाकर आनंदित हो उठा और उसे खर्च करने में लग गया ।

*वह थैला इतना बड़ा था की उसे खर्च करने में कई साल बीत गए, इस बीच वह प्रार्थना भूल गया । जब थैला खत्म होने को आया तब उसे याद आया कि "अरे! वह चार शब्दों की प्रार्थना क्या थी ।" उसने बहुत याद किया, उसे याद ही नहीं आया ।अब वह लोगों से पूँछने लगा । पहले पड़ोसी से पूछता है की "ऐसी कोई प्रार्थना तुम जानते हो क्या, जिसमें चार शब्द हैं । पड़ोसी ने कहा, "हाँ, एक चार शब्दों की प्रार्थना मुझे मालूम है, "ईश्वर मेरी मदद करो ।"

*उसने सुना और उसे लगा की ये वे शब्द नहीं थे, कुछ अलग थे । कुछ सुना होता है तो हमें जाना-पहचाना सा लगता है । फिर भी उसने वह शब्द बहुत बार दोहराए, लेकिन चाँदी के सिक्के नहीं बढ़े तो वह बहुत दुःखी हुआ ।

*फिर एक ब्राह्मण से मिला, उन्होंने बताया की "ईश्वर तुम महान हो" ये चार शब्दों की प्रार्थना हो सकती है, मगर इसके दोहराने से भी थैला नहीं भरा ।

*वह एक धनिक से मिला, उसने कहा "ईश्वर मुझे धन दो" यह प्रार्थना भी कारगर साबित नहीं हुई ।

*वह बहुत उदास हुआ उसने सभी से मिलकर देखा मगर उसे वह प्रार्थना नहीं मिली, जो पिताजी ने बताई थी । वह उदास होकर घर में बैठा हुआ था तब एक भिखारी साधु उसके दरवाजे पर आया ।

*उसने कहा, "सुबह से कुछ नहीं खाया, खाने के लिए कुछ हो तो दो ।" उस लड़के ने बचा हुआ खाना भिखारी साधु  को दे दिया । उस भिखारी साधु ने खाना खाकर बर्तन वापस लौटाया और ईश्वर से प्रार्थना की, "हे ईश्वर!आपका धन्यवाद ।" अचानक वह चौंक पड़ा और चिल्लाया की "अरे! यही तो वह चार शब्द थे ।" उसने वे शब्द दोहराने शुरू किए-"हे ईश्वर आपका धन्यवाद"........और उसके सिक्के बढ़ते गए... बढ़ते गए... इस तरह उसका पूरा थैला भर गया । इससे समझें की जब उसने किसी की मदद की तब उसे वह मंत्र फिर से मिल गया । "हे ईश्वर ! आपका धन्यवाद ।" यही उच्च प्रार्थना है क्योंकि जिस चीज के प्रति हम धन्यवाद देते हैं, वह चीज बढ़ती है । अगर पैसे के लिए धन्यवाद देते हैं तो पैसा बढ़ता है, प्रेम के लिए धन्यवाद देते हैं तो प्रेम बढ़ता है ।

*ईश्वर या गुरूजी के प्रति धन्यवाद के भाव निकलते हैं की ऐसा ज्ञान सुनने तथा पढ़ने का मौका हमें प्राप्त हुआ है । बिना किसी प्रयास से यह ज्ञान हमारे जीवन में उतर रहा है वर्ना ऐसे अनेक लोग हैं, जो झूठी मान्यताओं में जीते हैं और उन्हीं मान्यताओं में ही मरते हैं। मरते वक्त भी उन्हें सत्य का पता नहीं चलता। उसी अंधेरे में जीते हैं, मरते हैं ।

*ऊपर दी गई कहानी से समझें की "हे ईश्वर ! आपका धन्यवाद" ये चार शब्द, शब्द नहीं प्रार्थना की शक्ति हैं ।

*अगर यह चार शब्द दोहराना किसी के लिए कठिन है तो इसे तीन शब्दों में कह सकते हैं,

"ईश्वर आपका धन्यवाद ।

*ये तीन शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो दो शब्द कहें, "ईश्वर धन्यवाद !

*और दो शब्द भी ज्यादा लग रहे हों तो सिर्फ एक ही शब्द कह सकते हैं, "धन्यवाद ।"

*आइए, हम सब मिलकर एक साथ धन्यवाद दें उस ईश्वर को, जिसने हमें मनुष्य जन्म दिया और उसमें दी दो बातें - पहली "साँस का चलना" दूसरी "सत्य की प्यास ।" यही प्यास हमें खोजी से हमें इश्वर को मिलायेगी ।     


🙏🌹 जै श्रीकृष्ण,आपका धन्यवाद । 🌹🙏




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Friday, 1 February 2019

*कृष्ण से कृष्ण को मांगिए*

*हृदय की इच्छाएं शांत नहीं होती हैं। क्यों?

*एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी।
*किसी फकीर ने सम्राट से भिक्षा मांगी थी। सम्राट ने उससे कहा,''जो भी चाहते हो, मांग लो।
*दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था।

*उस फकीर ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा,''बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दें।''सम्राट ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है! लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई, तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था।

*वह तो जादुई था। जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई, वह उतना ही अधिक खाली होता गया!*
*सम्राट को दुखी देख वह फकीर बोला,''न भर सकें तो वैसा कह दें। मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा!
*ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि सम्राट अपना वचन पूरा नहीं कर सके !

*''सम्राट ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था, सभी उस पात्र में डाल दिया गया, लेकिन अद्भुत पात्र न भरा, सो न भरा।
*तब उस सम्राट ने पूछा,''भिक्षु, तुम्हारा पात्र साधारण नहीं है। उसे भरना मेरी सामर्थ्य से बाहर है। क्या मैं पूछ सकता हूं कि इस अद्भुत पात्र का रहस्य क्या है?

*वह फकीर हंसने लगा और बोला,
''कोई विशेष रहस्य नहीं। यह पात्र मनुष्य के हृदय से बनाया गया है।
*क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मनुष्य का हृदय कभी भी भरा नहीं जा सकता*?
*धन से, पद से, ज्ञान से- किसी से भी भरो, वह खाली ही रहेगा, क्योंकि इन चीजों से भरने के लिए वह बना ही नहीं है। इस सत्य को न जानने के कारण ही मनुष्य जितना पाता है, उतना ही दरिद्र होता जाता है।


*हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती हैं। क्यों?
*क्योंकि, हृदय तो परमात्मा को पाने के लिए बना है।
*शांति चाहिए ? संतृप्ति चाहिए ?
तो अपने संकल्प को कहिए कि "भगवान श्रीकृष्ण" के सेवा के अतिरिक्त और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।

"कृष्ण से कृष्ण को ही मांगिए ।"


*🙏🌺हरे कृष्ण🌺🙏*



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