Wednesday, 5 February 2020

नारद मोह प्रसंग I



परम सौभाग्यशाली मानसानुरागी जननमन सबहिं पुराणों में नारदजी के अनेक जन्मों का प्रसंग आता है। उन्होंने जीवन के अनेक रूपों का अनुभव किया है और वे अनुभव उनके अन्तर्मन में कहीं न कहीं संस्कारों के रूप में       विद्यमान हैं। 


हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।।

आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा।।

निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।।

सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।।

मानस बालकांड 124/1-4


मानस में लिखा है कि वे हिमालय की उपत्यका में आते हैं और जब वहाँ का वातावरण देखते हैं कि  बड़ी ,सुगन्धित वायु बह रही है, झरना बह रहा है  तथा चारों तरफ हरियाली है तो उन्हें लगता है कि भगवान का ध्यान करने के लिए यह स्थल बड़ा अनुकूल है, नारद वहाँ एक गुफा में बैठकर प्रभु के ध्यान में तल्लीन हो जाते हैं। आपको पता होगा कि नारद को दक्ष प्रजापति ने शाप दिया था कि तुम दो घड़ी से अधिक कहीं भी नहीं ठहर सकते। 


दक्ष द्वारा निर्मित पुत्र जब बड़े हो जाते थे तो नारद वहाँ पहुँच कर उन्हें ऐसा सत्संग प्रदान करते थे कि वे घर बार छोड़कर वन में चले जाते थे। इसीलिए दक्ष ने उन्हें कहीं अधिक देर तक न ठहरने का शाप दिया था। पर इस शाप से नारद की कोई हानि नहीं हुई,बल्कि लाभ ही हुआ। क्योंकि घूमते रहने से अधिकाधिक लोगों की समस्याओं से उनका परिचय होता गया और वे उनके दुखों को दूर करने में प्रयत्नशील होते रहे।


पर आज उनके अंतःकरण में अन्तर्मुखता की बृत्ति आ गयी और वे बैठकर ध्यान में लीन हो गये। फलस्वरूप प्रजापति का शाप ब्यर्थ चला गया,क्योंकि शाप तो तब कार्य करता,जब नारद देश और काल की सीमा में होते वे तो ध्यान में बैठकर, देश, काल और ब्यक्तित्व की सीमा से ऊपर उठ गये थे। इसका अर्थ यह है कि यदि ध्यान में बैठने पर भी यह याद बनी रहे कि मैं कहाँ बैठा हुआ हूँ,कितना समय हुआ है,मैं कौन हूँ,तो समझ लेना चाहिए कि ध्यान बिल्कुल अधूरा है।


उदाहरणार्थ,जब यह कहते हैं कि ध्यान कीजिये कि,अयोध्या नगर में सरयू बह रही हैं,सरयूजी के किनारे एक कल्पतरु के नीचे एक सिंहासन है और उस सिंहासन पर, भगवान राम और सीता बैठे हुए हैं, तब यदि ब्यक्ति देश के प्रति सजग होगा,तो उसे लगेगा कि नहीं, मैं तो इस शहर में ही बैठा हुआ हूँ। वह अयोध्या,बृन्दावन या उस देश की कल्पना नहीं कर सकता, जहाँ का वह ध्यान करना चाहता है। फलस्वरुप उसमें तन्मयता नहीं आ पायेगी। इसी प्रकार जब काल का चिन्तन करेगा,तब भी उसे दूरी की अनुभूति होगी। उसे लगेगा कि भगवान का अवतार तो कितना पहले हुआ था,अतः हमारे और उनके काल में बड़ी दूरी है,अब राम भला कहाँ हैं,कृष्ण कहाँ हैं ? इसका परिणाम यह होगा कि उसको सच्चा ध्यान नहीं लग पायेगा।


इसी प्रकार सच्चे ध्यान के लिए ब्यक्तित्व की सीमा को भी लाँघना पड़ता है। जैसे भगवान का ध्यान करता हुआ ब्यक्ति अपने आप को कुछ करता हुआ पाता है। भक्त ध्यान करता हुआ देखता है कि वह माला गूँथकर भगवान को पहना रहा है।अब वह अपने आपको जिस शरीर से माला पहनाता हुआ देखता है,वह स्थूल शरीर तो है नहीं,वह तो उसका भावनात्मक शरीर है। ऐसी स्थिति में यदि उसका स्थूल शरीर ही उसके चिन्तन में आता रहा,तो वह सच्ची तन्मयता नहीं प्राप्त कर सकेगा।


नारद ने देश,काल और ब्यक्तित्व तीनों से ही मुक्ति प्राप्त कर ली। इसलिए दक्ष के शाप का कोई अर्थ नहीं रह गया,क्योंकि वे न तो किसी स्थान में बैठे थे,न किसी काल में और न ब्यक्तित्व की सीमा में थे। वे दिब्य मनःस्थिति में थे। लेकिन स्वर्ग में बैठे हुए इन्द्र के मन में भय पैदा हो गया कि नारद कहीं स्वर्ग पर अधिकार करने के लिए तो तपस्या नहीं कर रहे हैं और वह ऐसा सोच, उनकी तपस्या भंग करने की चेष्टा में लग जाता है।


यहाँ पर गोस्वामीजी एक बड़े महत्व की मनोवैज्ञानिक बात कहते हैं। वैसे लगता तो यही है कि दुर्गुणों की ओर से ब्यक्ति के जीवन में बाधा आती है, लेकिन कभी कभी ऐसा भी दिखाई देता है कि दुर्गुण और सद्गुण मिलकर साधक के जीवन में बाधा की सृष्टि कर रहे हैं। नारद की तपस्या को भंग करने की बृत्ति किसी राक्षस या दैत्य के मन में नहीं आयी,वह आती है इन्द्र के मन में। और इन्द्र कौन है ? सबसे बड़ा पुण्यात्मा। सौ अश्वमेध करने वाला ही इन्द्र का पद प्राप्त करता है। तो ऐसा इन्द्र जो स्वयं सत्कर्म करने वाला है,वह दूसरे को सत्कर्म से विरत करने की चेष्टा करत है,तब यह बात बड़ी अटपटी-सी लगती है।


पर विद्वज्जन! यही समाज और जीवन दोनों का सत्य है। अच्छे काम में बाधा केवल बुरे लोग ही नहीं डालते, कभी - कभी अच्छे लोग भी डालते हैं। जब उनके मन में यह ईर्ष्या उत्पन्न होती है कि कहीं वह मुझसे बढ़िया काम न कर दे। अच्छा कहलाने वाले ऐसे ईर्ष्यालु ब्यक्ति भोगपरायण होते हैं। वे सत्कर्म के बदले कुछ पाना चाहते हैं। उनके मन में यही चिन्ता रहती है कि बँटवारे में सब मुझे ही मिले,दूसरों को कुछ न मिल पाये।


तुलसीदासजी से किसी ने पूछा कि स्वर्ग में जाकर ब्यक्ति तो दुर्गुणों से मुक्त हो जाता होगा, गोस्वामीजी ने ब्यंग्य करते हुए कहा - और दुर्गुण चाहे कम हो जाँय, पर वहाँ जाकर एक दुर्गुण बढ़ जाता है - और वह है ईर्ष्या। वे विनयपत्रिका में लिखते हैं -


"स्वर्गहु मिटइ न सावत"


स्वर्ग में सौतियाडाह नहीं मिटती, ईर्ष्या नहीं मिटती।


अब नारद हैं त्यागी और इन्द्र हैं भोगी। और विचित्रता यह है कि त्याग और भोग दोनों ही पुण्य के फल हैं। पुण्य से ब्यक्ति को भोग भी प्राप्त हो सकता है और वैराग्य भी। चुनाव तो ब्यक्ति को करना है। देवर्षि नारद तो  पुण्य के द्वारा वैराग्य पाने के पक्ष में हैं, पर इन्द्र में भय उत्पन्न होता है कि कहीं ए मेरे स्वर्ग पर अधिकार पाने के लिए ही तो तपस्या नहीं कर रहे हैं। इन्द्र अपने मापदंड से नारद को मापता है। उसे लगता है कि हमने इतना सत्कर्म करके स्वर्ग प्राप्त किया, नारद भी निश्चय ही स्वर्ग पाने के लिए तप कर रहे होंगे। और तब यहाँ पर दुर्गुण के साथ देवता का एक अनोखा समझौता हो जाता है।


इन्द्र काम को बुलाकर कहता है - "सहित सहाय जाहु मम हेतू।" 


- कामदेव तुम अपने सहायकों के साथ जाओ और नारद को ध्यान से विरत करने की चेष्टा करो। काम अप्सराओं को लेकर नारद के पास आता है, पर नारद के मन में अप्सराओं के मोहक हाव-भाव,नृत्य आदि का रंचमात्र प्रभाव भी नहीं पड़ा। वे शान्त भाव में बैठे रहते हैं। यह देख काम के मन में यह भय उत्पन्न होता है कि कहीं मुनि क्रोध करके मुझे भस्म न कर दें। नारद शान्त भाव से काम को देखते हैं। काम,डर के मारे उनके चरणों में जा गिरता है और कहता है महाराज ! मैंने जो कुछ किया है,वह इन्द्र के कहने से किया है। काम के इस कथन का अर्थ यही है कि यदि दण्ड देना हो तो इन्द्र को दीजिएगा, मुझे नहीं। 


मित्रों ! यही ब्यक्ति के जीवन की बिडम्बना है। अभी तक तो काम, इन्द्र का सहयोगी बना हुआ था और अब जब अपने उद्यम में असफल हो गया, तब कहता है कि यह मैंने अपनी इच्छा से नहीं किया है। फिर भी नारद को क्रोध नहीं आया। 


श्रद्धेय मानस-रत्नजी ने  "कामात्क्रोधोभिजायते"  गीताजी के सूत्र का , इस प्रसंग में विलक्षण विस्तार किया।


और नारदजी ने मुस्कुराते हुए काम से कहा - तुम इन्द्र से जाकर कह देना कि मेरे अंतःकरण में स्वर्ग का कोई लोभ नहीं है, वह आनन्द से स्वर्ग के भोगों को भोगे, राज्य करे। काम नारद के चरणों में प्रणाम करके चला गया।


लेकिन एक विचित्र बात हो गयी। अभी नारद के जीवन में सद्विचारों की,सत्कर्मों की, साधना की इतनी बढ़िया खेती हुई थी, पर अब उसकी बगल में घास उग आई और नारद उस घास को अनदेखा कर देते हैं, घास की पहचान नहीं कर पाते हैं। यही नारद की समस्या है। रोग तब होता है जब रोगी कुपथ्य करता है। नारद ने सभी इन्द्रियाँ से तो कुपथ्य रोक दिया,पर एक इन्द्रिय से कुपथ्य हो गया। अप्सराओं का सौन्दर्य सामने आया, तो नेत्र से रंचमात्र कुपथ्य नहीं किया, उस पर दृष्टि तक नहीं डाली। वहीं पर उन अप्सराओं ने दिब्य सुगंध की सृष्टि की, तो नासिका के द्वारा भी उन्होंने कोई कुपथ्य नहीं किया। जिह्वा के माध्यम से भी नारद  किसी वस्तु का कुपथ्य करने वाले थे नहीं। स्पर्श-सुख को त्याग कर उन्होंने त्वचा का भी कोई कुपथ्य नहीं किया। पर एक कुपथ्य से वे बच नहीं पाये। वैसे उससे बच पाना भी बड़ा कठिन है। 


मानस-रत्नजी विनयपत्रिका के एक पद का उद्धरण देते हुए प्रायः सुनाते हैं कि-


"कोउ कछु कहै,कोउ कछु दे, यह वासना न उर से जाई।।"


वह कुपथ्य श्रवणेन्द्रिय का था। आँख, नाक, जिह्वा से कुपथ्य रोकना सरल है, पर कान का कुपथ्य ऐसा प्रिय लगता है कि बड़े-बड़े त्यागी पुरुष भी इस कुपथ्य से बच नहीं पाते। यह कान का कुपथ्य क्या था ? मित्रों ! जब काम जाने लगा तो जाते-जाते एक बात नारदजी के कान में कहता गया, और नारदजी ने बड़े प्रेम से उसे भीतर ले लिया। काम कहता गया - "महाराज ! विश्व के इतिहास में आपसे बढ़कर कोई महापुरुष हुआ ही नहीं । बस ज्योंही प्रशंसा का कुपथ्य,नारद के कान में पैठ गया और उनके अंतःकरण में घास अंकुरित हो गयी। चाहे उसे अहंकार की घास कह लीजिये या मोह की।


कहा जाता है - "जैसा अन्न,वैसा मन।" अतः अन्न के दोषों से बचने के लिए भक्तगण पहले भगवान को भोग लगाते हैं और तब उसका प्रसाद सबको बाँटकर फिर उसको स्वयं ग्रहण करते हैं। तो सामान्य भोजन को तो बहुत से लोग भोग लगाकर ग्रहण करते हैं, पर प्रशंसा के भोजन का भोग लगाना भूल जाते हैं। 


प्रशंसा का भोजन ऐसा होता है जो ब्यक्ति के जीवन में अहंकार की सृष्टि करता है। हम जब भी अपनी प्रशंसा सुनेंगे, अहंकार होने का भय बना ही रहेगा। ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोई प्रशंसा करे ही न। ऐसी स्थिति में उपाय क्या है ?  यही कि इस प्रशंसा को भगवान को समर्पित कर दिया जाय और उसे बाँट दिया जाय। जब भी कानों में प्रशंसा आये, इसे तुरन्त भगवान को निवेदित कर दें।  नारद ने भी ऐसा किया, लेकिन बहुत देर बाद नियम यह है कि पहले भोग लगालें फिर भोजन करें। पर नारदजी तो पहले भोजन कर लेते हैं और बाद में जब थोड़ी सी जूठन बच जाती है, तब भगवान को भोग लगाते हैं। वे क्रम को उलट देते हैं।


भगवान श्रीराम ने श्रीभरतजी के सामने प्रशंसा की लम्बी थाल परोसी और बोले -


"तीनि काल त्रिभुवन मत मोरे। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।।

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।।"

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब,अखिल अमंगल भार।

लोक सुजसु परलोक सुखु,सुमिरत नामु तुम्हार।।"


बन्धुओं ! कितना बड़ा था प्रशंसा का ब्यंजन और परोसने वाले थे साक्षात् भगवान, लेकिन भरतजी ने उसका भोग भगवान को लगा दिया। 


भगवान ने पूछा - बताओ भरत! मैं ठीक कह रहा हूँ कि नहीं? मेरी दृष्टि पर तुम्हें विश्वास है कि नहीं?


भरतजी - प्रभु ! मैं आपकी दृष्टि पर विश्वास कैसे न करूँ? जब आप कह रहे हैं तो अवश्य होगा।


"अब तो अपनी निन्दा नहीं करोगे, अपने को पापी नहीं कहोगे? भगवान बोले !


भरतजी ने कहा - "नहीं भगवान ! मैं जानता हूँ,आपके सामने एक समस्या है।"


वह क्या? -


"यह कि आप दोष देख ही नहीं पाते,इसलिए मेरे दोष आपको दिखाई नहीं देते हैं, तो यह ठीक ही है।


भगवान ने पूछा - अच्छा ! दोष देखना मुझे यदि नहीं आता तो गुण देखना तो आता है।


भरतजी बोले- भगवान ! गुण देखना आपको आता तो है,पर मैं आपसे पूछता हूँ,कि तोता यदि बहुत बढ़िया श्लोक पढ़ने लगे और बन्दर बहुत बढ़िया नाचने लगे,तो वह बन्दर या तोते की विशेषता है ,अथवा पढ़ाने और नचाने वाले की?


भगवान ने कहा-पढ़ाने और नचानेवाले की !


महाराज ! बिल्कुल ठीक कहा आपने ! मैं तो तोते और बन्दर की तरह हूँ। यदि मुझमें कोई विशेषता दिखाई देती है तो पढ़ानेवाले और नचानेवाले तो आप ही हैं। इसलिए यह प्रशंसा आपको ही अर्पित है।


"सुक नाचहिं कपि पाठ प्रवीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।"


भगवान ने भरत से कहा - भरत! तो प्रशंसा तुमने लौटा दी !


भरतजी बोले - "प्रभु ! प्रशंसा का कुपथ्य सबमें अजीर्ण पैदा कर देता है,सबको डमरुआ रोग से ग्रस्त कर देता है, लेकिन आप इस प्रशंसा को पचाने में बड़े निपुण हैं। अनादिकाल से सारे भक्त आपकी स्तुति कर रहे हैं,पर आपको तो कभी अहंकार हुआ नहीं, ऐसी स्थिति में यह प्रशंसा आपको निवेदित है।


विद्वज्जन ! नारद ने भी यदि ऐसा ही किया होता और काम की प्रशँसा सुनकर यदि वे गद्गद होकर सोचते कि भगवान कितने कृपावत्सल हैं, जो दुर्गुणों से मुझे बचा लिए और काम, क्रोध, लोभ से मुझे बचा लिए और मुझे उनसे सुरक्षित रखा, तो प्रशंसा, भगवान को अर्पित हो जाती और नारद अहंकार से न बँध पाते।



श्रीराम जय राम जय जय राम।

नमन सबहिं।



प्रभु लीला

🥀⚘जय श्री राधे ⚘🥀

प्रभु का स्वभाव भी विचित्र है,अपनी ऐसी लीला फैला देतें हैं कि मानव मन तो उसमें उलझ कर ही रह जाता है।

दक्षिण भारत में मदुरान्तक एक प्रसिद्ध स्थान है। इसका प्राचीन नाम बकुलारण्य है। यहाँ प्रसिद्ध राम मंदिर के बराबर में ही जानकी माता का मंदिर है।

जानकी माता मंदिर के निर्माण-चमत्कार से एक अंग्रेज़ की अटूट श्रद्धा जुड़ी हुई है। लायन्स प्लेस भारी व्यय और भरपूर अच्छी से तकनीक से नदी पर बाँध बनवाता था I

किन्तु प्रति वर्ष बरसात के मौसम में बाँध को बचाने के अनेक प्रयत्नों के उपरांत भी बाँध टूट जाता था। लायन्स प्लेस बहुत परेशान था।

एक दिन गाँव के एक वैष्णव ने उससे जानकी माता के छोटे से मंदिर को कुछ बड़ा बनवा देने का आग्रह किया।

 लायन्स प्लेस ने व्यंग्य करते हुये कहा-"तुम्हारी जानकी माता पर बड़ी श्रद्धा है, किन्तु वह तुम्हारे लिये करती ही क्या है ? 

बाँध को टूटने से बचा कर वह तुम्हारा हित तो करती नहीं ? 

यदि इस वर्ष तुम्हारी जानकी माता बाँध को टूटने से बचा लेंगी तो जानकी माता का मंदिर मैं बनवाऊँगा ।

पुनः बाँध बनवाया गया,यह सन 1778 की घटना है। अन्य वर्षों की अपेक्षा इस बहुत अधिक, भयानक वर्षा हुई।

 बाँध ऊपर तक भर गया था, मूसलाधार वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक प्रकार से त्राहि-त्राहि का मौसम था।

लायन्स प्लेस को पूरा यक़ीन था कि इतनी भयानक वर्षा में बाँध तो कब का टूट कर बह चुका होगा ।

 वह अपनी जान जोखिम में डाल कर उसी भयानक मौसम में बाँध को देखने निकल पड़े। वहाँ जाकर देखा को उस दृश्य को देख कर उनकी आँखें फटी की फटी रह गई।

उन्होंने देखा कि एक विशालकाय बंदर रूपी मानव अपने दोनों विशाल हाथों से बाँध को मज़बूती से थामें हुये है  I

और दो ज्योतिर्मय युवक,एक श्याम वर्ण,एक ग़ौर वर्ण- धनुष वाण लिये उस बाँध पर इधर से उधर घूम रहे हैं । बाँध पूरी तरह सुरक्षित है,तनिक भी क्षतिग्रस्त नहीं । 

एकाएक लायन्स प्लेस के दोनों हाथ प्रणाम की मुद्रा में जुड़ गये ।

उन्होंने लौट कर गाँव वालों को सारी बातें बताई। जय जय कारें गूँज उठे। गाँव वालों ने उन्हें बताया कि श्याम वर्ण युवक हमारी सीता माता के पति हैं I

और ग़ौर वर्ण युवक हमारी सीता मैया के देवर हैं एवं यह बंदर रूपी मानव हमारे हनुमान जी और हमारी सीता मैया के पुत्र-तुल्य सेवक हैं।

 आश्चर्यचकित रह गया आग्रेज अफ़सर लायन्स प्लेस। अगले ही दिन से लायन्स प्लेस ने सीता माता का मंदिर बनवाना प्रारम्भ कर दिया।


⚘ साभार - श्री हरि मंदिर वृंदावन ⚘

हठयोग - सभी पापकर्मों से मुक्ति पाने का उपाय है हठयोग ।

हठयोग के प्रणेता भगवान शिव हैं | भगवान शिव के अनुसार राजयोग सर्वोत्तम है और एक सिद्ध राजयोगी बनने के लिए हठयोग सीढ़ी के समान है | यद्यपि कहीं-कहीं यह भी कहा गया है कि यह दोनों अन्योनाश्रित है अर्थात जिस प्रकार से बिना हठयोग के राजयोग नहीं सिद्ध हो सकता उसी प्रकार से हठयोग के लिए भी राजयोग का अभ्यास आवश्यक है |

‘चित्तवृत्तियों को विचारों द्वारा दृढ़तापूर्वक रोकना और आसन, प्राणायाम आदि की सहायता से उसको (चित्त अर्थात मन को) परमेश्वर में लय करना ही योग है’ | शरीर की बात की जाये तो प्राण और अपान वायु की एकता का नाम ही योग है |

वास्तव में प्राण और अपान वायु के वश में हो कर ही ये जीव ऊपर और नीचे दौड़ रहा है | बायें (इड़ा नाड़ी) और दाहिने (पिंगला नाड़ी) मार्ग से गति करने की वजह से यह दिखाई भी नहीं देता |

जिस प्रकार से रस्सी से बंधा हुआ शिकारी बाज उड़ने के बाद भी फिर खिंच के चला आता है, उसी प्रकार से सत, रज और तम गुणों से बंधा हुआ यह जीव अपान वायु द्वारा खिंच कर चला आता है (शरीर में) | दरअसल प्राण अपान को और अपान प्राण को खींचता है और इस प्रकार ऊपर और नीचे ठहरे हुए इन दोनों वायुओं के रहस्य को जो जानता है वास्तव में वही योग के रहस्य को जानता है |

हठयोग: हठयोग में ‘ह’ सूर्य है और ‘ठ’ चन्द्रमा | इन दोनों के योग को हम सूर्य-चन्द्रमा, इड़ा-पिंगला, और प्राण-अपान का योग भी समझ सकते हैं | इन दोनों के योग से जो प्राणायाम (जिससे प्राण को साधा जा सके) होता है वही हठयोग है |

मोटे तौर पर समझे तो अनुलोम-विलोम प्राणायाम यानी इड़ा, और पिंगला नाड़ी को एक कर सुषुम्ना द्वारा प्राणायाम करना जिससे प्राण और अपान का एकत्व होकर समाधि का लाभ हो, यही हठयोग है |

यह समाधि वह प्रक्रिया है जिससे जन्म-जन्मान्तरों के कषाय-कल्मष (मोह, आसक्ति और वासना) नष्ट होने लगते हैं और जीव सुषुम्ना से होते हुए ब्रह्मरन्ध्र में स्थित परमात्मा से मिलन के लिए चल पड़ता है |

समाधि पर अधिकार वाले योगी को सर्वाधिकार प्राप्त होता है | काल (जिसके साम्राज्य में सब आते है) भी उसका अनुचर हो जाता है | ऐसा व्यक्ति ‘स्वयं’ में अर्थात ब्रह्म में स्थित हो जाता है |

अब थोड़ा सा विषयांतर होते हुए समाधि पर आते हैं | भारतीय धार्मिक ग्रंथों में दिया हुआ है कि ध्यान और समाधि से पूर्व जन्म के पाप मिटने लगते हैं |

अलग-अलग ग्रंथों में यही बात कुछ मंत्रो के लिए भी दी हुई है कि उन विशेष मन्त्रों के जप से पूर्व जन्म के पाप मिटने लगते है और साधक का अभ्युदय या उत्कर्ष होता है और यदि प्रभु की कृपा हो जाये या उनका दर्शन हो जाये तो भी जन्म-जन्मान्तरों के पाप नष्ट होने लगते हैं |

अब प्रश्न यह उठता है कि यदि मन्त्रों के जप से, या यौगिक क्रियाओं तथा साधनाओं से पूर्व जन्म के पाप मिटने लगते तो स्वर्ग और नर्क आदि लोकों की आवश्यकता क्यों होती ? जिन धार्मिक ग्रंथों में उपरोक्त बातें लिखीं हैं वही यह भी लिखा है कि कर्मों के फल तो भोगना ही पड़ता है चाहे ईश्वरीय कृपा हो जाये तो भी | तो फिर आखिर सत्य क्या है?

दरअसल आज के समय में जब एक आम आदमी बिना किसी कारण के कष्ट भोगता है तो उसके मन में ये विचार आता है कि पूर्व जन्म में उसने कोई पाप किया होगा जिसकी वजह से आज वह कष्ट भोग रहा है और अगर वह धार्मिक है, आस्तिक है तो यह विचार काफी दृढ़ता से मष्तिष्क में उठता है |

लेकिन जब कोई व्यक्ति कष्ट भोग रहा होता है तो उसके पीछे पूर्व जन्म के कर्म नहीं बल्कि उसके पीछे उसकी जन्म-जन्मान्तर की आसक्तियां, मोह-बन्धन, और वासनाएं होती हैं |

अगर इन मोह-बन्धन और आसक्तियों को किसी प्रकार से नष्ट कर दिया जाये तो वह व्यक्ति दुःख तो भोगेगा लेकिन उस दुःख में पीड़ा नहीं होगी ऐसा व्यक्ति अगर सुख और ऐश्वर्य भी भोगेगा तो उसमे प्रमाद, घमण्ड या ख़ुशी का भाव नहीं होगा | उसके लिए सुख और दुःख एक सामान हो जायेंगे और उसे इन दोनों में एक ही भाव (आनन्द) की अनुभूति होगी |

पढ़ने में यह बात पुस्तकीय ज्ञान जैसी लग सकती है लेकिन बात प्रामाणिक है | पुराणों में और धर्मग्रंथों में जहाँ ‘पूर्वजन्म के पापों के नष्ट होने की’ व्याख्या की गयी है दरअसल वहाँ ‘पूर्वजन्म की आसक्तियों, बन्धनों और वासनाओं के नष्ट होने की’ बात कही गयी है |

ये बिलकुल उसी तरह से है जैसे अगर कोई डॉक्टर, ऑपरेशन से पहले उस नर्व-सिस्टम का, जो मष्तिष्क तक पीड़ा की जानकारी पहुंचाती है, उस अंग (जिसमे शल्य-क्रिया करनी है) से विच्छेद कर दे तो रोगी को ऑपरेशन की चीर-फाड़ के दौरान होने वाले दर्द की जरा भी अनुभूति नहीं होगी जबकि वह बहुत कष्टकारक प्रक्रिया होगी |

योग की महिमा अपार है | एक बार संदेह में आकर पार्वती जी ने भगवान शिव से एक सटीक प्रश्न किया | उन्होंने महादेव जी से पूछा “ज्ञानी लोग कहते हैं कि ज्ञान प्राप्ति से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है अतः प्रयत्न पूर्वक ज्ञान प्राप्त करना चाहिए और आप सिद्ध हुए योग को ही मोक्ष देने वाला बताते हैं, ऐसा क्यों”?

इसके उत्तर में ईश्वर ने कहा “हे प्रिये! केवल ज्ञान से ही मोक्ष प्राप्ति होती है, दूसरे साधन से नहीं, उनका यह कहना बिलकुल वैसे ही है जैसे कोई उत्साही वीर पुरुष कहे कि अस्त्र-शस्त्रों से ही शत्रु की पराजय होती है लेकिन तुम्ही बताओं क्या बिना युद्ध-कौशल और पराक्रम के (केवल अस्त्र-शस्त्रों की सहायता से) कोई युद्ध जीता जा सकता है ?

उसी प्रकार से बिना योगाभ्यास के, केवल ज्ञान मुक्ति नहीं दिला सकता | कोई महापुरुष ज्ञानी हो या त्यागी हो, धर्म के रास्ते पर चलने वाला हो अथवा इन्द्रियों को जीतने वाला जितेन्द्रिय हो किन्तु हे प्रिये बिना योग के कोई देवपुरुष भी मोक्ष का अधिकारी नहीं बन सकता |

उस अविनाशी आत्मा के साक्षात्कार करने में एक योग ही उपाय है दूसरा कोई नहीं | श्रेष्ठ पुरुष योगाभ्यास द्वारा ही उस आत्मा को जानकार इस हर्ष-शोक रुपी संसार का परित्याग करते हैं” |

हठयोग में प्राणायाम का अभ्यास करते-करते जब प्राणवायु सुषुम्ना में प्रवेश करती है तब मन स्थिरता को प्राप्त होता है | इसलिए प्राणायाम का अभ्यास तब तक करना चाहिए जब तक की सुषुम्ना में प्राण वायु का संचार ना होने लगे |

बिना सुषुम्ना नाड़ी में प्राणवायु के प्रवेश हुए मन का स्थिर होना लगभग असंभव है | और अगर सुषुम्ना में प्राणवायु के प्रवेश के बाद किसी कारणवश प्राणायाम का अभ्यास छूट भी गया तो भी साधक योगसाधना के मार्ग पर पीछे नहीं जाएगा, वह जब भी अभ्यास पुनः प्रारम्भ करेगा वहीँ से आगे बढ़ेगा | इस प्रकार से मन के स्थिर हो जाने को मनोन्मनी अवस्था कहते हैं |

सामान्यतया सुषुम्ना नाड़ी कफ़ आदि बंधनों से ढकी रहती है | प्राणायाम के निरंतर अभ्यास से वह मार्ग शुद्ध हो जाता है और प्राणवायु, सुषुम्ना नाड़ी के मुख को अच्छे से तोड़ देती है और फिर उसमे प्रवेश करती है |

हठयोग में ही कहीं-कहीं आष्टांग योग और कहीं-कहीं षडांग योग का ज़िक्र मिलता है | यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह आठ अंग अष्टांग योग के अंग है | इनमे से यम और नियम को छोड़कर शेष छह षडांग योग के अंग है | योग के इन आठ अंगो का साधन करने से, इन्ही के क्रम से मलिनता का नाश होता है और ज्ञान का प्रकाश होता है अर्थात शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति होती है |

यम: किसी जीव को नहीं मारना, सच बोलना, कभी चोरी ना करना और ना ही किसी को चोरी के लिए कहना, बिंदु (वीर्य) की रक्षा सदैव करना और किसी प्रकार के धन, द्रव्यादी की इच्छा न करना यम के अंतर्गत आता है |

आज के युग में इन सभी का कठोरता से पालन करना एक कठिन कार्य है लेकिन लम्बे समय तक इनके अभ्यास से कुछ चमत्कारिक परिणाम दिखाई पड़ सकते हैं जैसे हिंसा न करने से कोई भी मनुष्य, हिंसक पशु, पक्षी, व्याघ्र और सर्प आदि का भय नहीं रह जाता | ऐसा कोई हिंसक प्राणी सामने आ भी जाये तो उस मनुष्य को देखते ही शांत हो जाता है |

सत्य बोलने के अभ्यास से वाकसिद्धि मिल जाती है अर्थात ऐसा मनुष्य जो कुछ भी कहता है वह वास्तव में घटित हो जाता है | कभी किसी प्रकार की चोरी ना करने से वह लोकप्रिय हो जाता है |

किसी प्रकार के धन-द्रव्यादी की इच्छा ना करने से आवश्यक वस्तुएं सदा अपने आप ही प्राप्त हो जाती हैं | धन-द्रव्यादी की इच्छा ना करने से विषयों में आसक्ति भी समाप्त होने लगती है ऐसी स्थिति में पूर्व जन्मों का ज्ञान भी होने लगता है |

कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करके वीर्य की रक्षा करने से वह सौन्दर्यवान तथा प्रचंड बलशाली होने लगता है और इसके साथ ही उसका शरीर ‘अजर’ होने लगता है |

नियम: शौच (पवित्रता), सन्तोष, तप, स्वाध्याय, एवं ईश्वर की भक्ति ही नियम है | इनका महात्म्य इस प्रकार से है कि शौच के साधन से सत्वबुद्धि, मन की शुद्धता, एकाग्रता, तथा इन्द्रियों पर विजय मिलती है |

संतोष से उत्तम सुख मिलता है | वास्तव में आसक्तियों एवं वासनाओं से मुक्ति मिलने पर अपने आप शाश्वत सुख की प्राप्ति होने लगती है | तप से शरीर सिद्ध होता है और इन्द्रियों की सिद्धि (जैसे दूरश्रवण या दूरदृष्टी की सिद्धि मिलना) मिलती है अर्थात शरीर में जो रोगादि का भय होता है वह नष्ट हो जाता है |

स्वाध्याय से ईष्ट देवता के दर्शन होते हैं और जो मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर कर सकें, ऐसे ऋषि-मुनियों के दर्शन होते हैं | इन सब के साथ ईश्वर में भक्ति होने पर, समाधि का लाभ तथा उनके परमधाम की प्राप्ति होती है |

आसन: जिससे स्थिरता का सुख हो अर्थात जब तक इच्छा करे, एक ही आसन में बैठे रहने पर अगर किसी भी प्रकार का क्लेश ना हो तो उसे आसन कहते है | आसन सिद्ध होने पर साधक सर्दी,गर्मी, सुख, दुःख आदि के प्रभाव से रहित हो जाता है | मन को अपनी चेतना के वशीभूत कर लेता है और उसके सारे रोग नष्ट हो जाते है | कहा भी गया है-

“आसनं विजितम येन जितम तेन जगत्रयम” अर्थात जिसने आसन को जीत लिया समझो तीनो लोकों को जीत लिया |

ॐ नम: शिवाय।

(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Tuesday, 21 January 2020

" कान्हा " का मिट्टी खाना......

  🙏 ।।श्रीमत्कुंजबिहारिणे नमः।।   🙏
         

भगवान प्रतिदिन गोपियों के यहाँ माखन चुराने पधारते है। लेकिन आज भगवान का मन खेलने में नहीं है।
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भगवान बोले की माखन तो बहुत खायो है और अंदर से पेट भी चिकनो हो गयो है। जैसी सफाई मिट्टी से हो सकती है और किसी चीज से नहीं हो सकती। भगवान ने मिट्टी उठाकर मुँह में रख ली।
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भगवान को मिट्टी खाते हुए श्रीदामा ने देख लिए और बोले की क्यों रे कनवा तूने मिट्टी खाई ? भगवान ने ना में गर्दन हिला दी... श्रीदामा ने फिर पूछा तो भगवान ने फिर से ना में गर्दन हिला कर जवाब दिया।
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श्रीदामा ने कहा की इसे आज मैया के पास ले चलो। पहले ये माखन चुरा के खाता था और अब मिट्टी भी खाने लगा है। तो दो सखाओ ने भगवान के हस्त कमल पकडे और दो सखाओ ने चरण कमल पकडे। और डंडा डोली
(झूला झुलाते हुए) करते हुए ले के माँ के पास गए। और मैया के पास जाकर बोले-
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तेरे लाला ने माटी खाई.... यशोदा सुन माई ....
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सुनत ही माटी को नाम ब्रजरानी दौड़ आई और पकड़ हरी को हाथ,
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कैसे तूने माटी खाई ?
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तो तुनक तुनक तुतलाय के... हूँ बोले श्याम... मैंने नाही माटी खाई नाहक लगायो नाम।
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भगवान कहते है मैया मैंने माटी नहीं खाई ? ये सब सखा झूठ बोल रहे है।
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माँ बोली, लाला एक संसार में तू ही सचधारी पैदा हुआ है बाकि सब झूठे है ? आज मैं तेरे को सीधो कर दूंगी।
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तो माँ हाथ में एक लकड़ी लेकर आई और भगवान को डराने लगी। जब भगवान ने माँ के हाथो में लकड़ी देखि तो झर-झर भगवान की आँखों से आंसू टपकने लगे।
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राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से पूछा- गुरुदेव, जिनकी एक भृकुटि टेढ़ी हो जाये तो काल भीडर जाता है। लेकिन आज माँ के हाथ में लकड़ी देख कर भगवान की आँखों से आंसू आ रहे है। क्यों ?
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ये नन्द और यशोदा कोन है ? जिनको भगवान ने इतना बड़ा अधिकार दे दिया ?
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शुकदेव जी कहते है कि हे.. परीक्षित, पूर्व जन्म में ये द्रोण नाम के वसु थे और इनकी पत्नी का नाम था धरा । ये निःसंतान थे। और इन्होने भगवान की तपस्या की। भगवान प्रकट हो गए और बोले की आप वर मांगिये।
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तो इन्होने कहा भगवान, आप हमे ये वरदान दीजिये की हमे आपकी बाल लीला का दर्शन हो। हमे इस जन्म में सब कुछ मिला लेकिन हमारेसंतान नही हुई। तो हम आपकी बाल लीला देखना चाहते है।
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भगवान बोले की, कृष्णावतार में आप मेरी बाल लीला का दर्शन करोगे।
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ये द्रोण ही नन्द बाबा बने और उनकी पत्नी धरा ही यशोदा है। दोनों को भगवान अपनी बाल लीला का दर्शन करवा रहे है।
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माँ पूछ रही है तेने माटी खाई ?
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भगवान कहते है नही खाई मैया, मैंने माटी नाही खाई।
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हाथ में लकड़ी ले के माँ डरा रही है। भगवान ने कहा यदि मैया तेरे को मो पर विश्वास नही है तो मेरा मुख देख ले।
साँच को आंच कहाँ तो छोटो सो मुखारविंद कृष्ण हूँ ने फाड़ दियो। भगवान ने अपना छोटा सा मुँह खोला।
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और माँ मुँह में झांक-कर देखती है तो आज सारे ब्रह्माण्ड का दर्शन माँ को हो रहा है। केवल ब्रह्माण्ड ही नही गोकुल और नन्द भवन का दर्शन कर रही है। ना ही गोकुल और नन्द भवन का दर्शन कर रही है। और नन्द भवन में कृष्णा और स्वयं का दर्शन भी माँ को हो रहा है।
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अब माँ बोली की मेरे लाला के मुँह में अलाय- बलाय कहाँ से आ गई ? थर थर डर के माँ कांपने लगी।
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भगवान समझ गए आज माँ ने मेरे ऐश्वर्ये का दर्शन कर लिया है कहीं ऐसा ना हो की माँ के अंदर से मेरे लिए प्रेम समाप्त ना हो जाये। और मैं तो ब्रजवासियों के बीच प्रेम लीला करने आया हूँ। क्योंकि जहाँ ऐश्वर्ये है वहां प्रेम नही
है। ऐसा सोच कर भगवान मंद मंद मुस्कराने लगे।

भागवत में भगवान की हंसी को माया कहा है।
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भगवान ने माया का माँ पर प्रभाव डाला और जब थोड़ी देर में माँ ने आँखे खोली। तो भगवान अपनी माँ से पूछने लगे मैया तेने हमारे मुख में माटी देखि ?
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माँ बोली की सब जग झूठो केवल मेरो लाला सांचो।
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भगवान की मुस्कराहट से माँ सब कुछ भूल गई।  इस प्रकार से प्रभु ने ढमृतिका भक्षण लीला की है।
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बोलो मेरी प्यारी यशोदा मैया की जय

🙏 ॥ जय श्री राधे ॥ 🙏

Wednesday, 11 December 2019

🦃 मयूर पंख 🦃

       
 वनवास के दौरान माता सीताजी को
पानी की प्यास लगी, तभी श्रीरामजी ने
चारों ओर देखा, तो उनको दूर-दूर तक
     जंगल ही जंगल दिख रहा था.
 कुदरत से प्रार्थना करी ~ हे जंगलजी !
     आसपास जहाँ कहीं पानी हो,
  वहाँ जाने का मार्ग कृपया सुझाईये.

      तभी वहाँ एक मयूर ने आकर 
 श्रीरामजी से कहा कि आगे थोड़ी दूर पर
    एक जलाशय है. चलिए मैं आपका
      मार्ग पथ प्रदर्शक बनता हूँ,  किंतु
      मार्ग में हमारी भूल चूक होने की
                 संभावना है.

     श्रीरामजी ने पूछा ~ वह क्यों ?
      तब मयूर ने उत्तर दिया कि ~
   मैं उड़ता हुआ जाऊंगा और आप
   चलते  हुए आएंगे, इसलिए मार्ग में
 मैं अपना एक-एक पंख बिखेरता हुआ
     जाऊंगा. उस के सहारे आप
   जलाशय तक पहुँच ही जाओगे.

  इस बात को हम सभी जानते हैं कि
  मयूर के पंख, एक विशेष समय एवं
    एक विशेष ऋतु में ही बिखरते हैं.
     अगर वह अपनी इच्छा विरुद्ध
         पंखों को बिखेरेगा, तो
        उसकी मृत्यु हो जाती है.

    और वही हुआ. अंत में जब मयूर
   अपनी अंतिम सांस ले रहा होता है,
      उसने मन में ही कहा कि
    वह कितना भाग्यशाली है, कि
    जो जगत की प्यास बुझाते हैं,
  ऐसे प्रभु की प्यास बुझाने का उसे
          सौभाग्य प्राप्त हुआ.
        मेरा जीवन धन्य हो गया.
 अब मेरी कोई भी इच्छा शेष नहीं रही.

तभी भगवान श्रीराम ने मयूर से कहा कि
 मेरे लिए तुमने जो मयूर पंख बिखेरकर,
   मुझ पर जो ऋणानुबंध चढ़ाया है,
     मैं उस ऋण को अगले जन्म में
              जरूर चुकाऊंगा ....
     ★ मेरे सिर पर धारण करके  ★

        तत्पश्चात अगले जन्म में
     श्री कृष्ण अवतार में उन्होंने
    अपने माथे पर मयूर पंख को
      धारण कर वचन अनुसार
    उस मयूर का ऋण उतारा था.

            🔅🔅🦃🔅🔅

      📍  तात्पर्य यही है कि  📍
 अगर भगवान को ऋण उतारने के लिए
        पुनः जन्म लेना पड़ता है, तो
  हम तो मानव हैं. न जाने हम कितने ही
          ऋणानुबंध से बंधे हैं.
     उसे उतारने के लिए हमें तो
   कई जन्म भी कम पड़ जाएंगे.
          ~  अर्थात  ~
    जो भी भला हम कर सकते हैं,
      इसी जन्म में हमें करना है.


(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Wednesday, 9 October 2019

सम्पूर्ण समर्पण युक्त विश्वास

कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र को विशाल अश्वरोही सेनाओं के आवागमन के योग्य बनाने हेतु तैयार किया जा रहा था। प्रतिस्पर्धी तंबुओं के लिये स्थान साफ किये जा रहे थे। विशाल सेनाओं के लिये भोजन पकाने हेतु लकड़ियों के विशाल गट्ठर बनाये जा रहे थे। हाथियों द्वारा वृक्षों को गिराया जा रहा था। ऐसे ही एक वृक्ष पर एक गौरैया का घोंसला था जिसमें चार छोटे बच्चे थे। जैसे ही पेड़ को गिराया गया उसका घोेंसला धरती पर गिर पड़ा। बच्चे जो अभी उड़ने के लिये बहुत छोटे थे, चमत्कारिक ढंग से सही-सलामत थे।

असुरक्षित व आतंकित गौरैया ने चारों ओर मदद के लिये देखा। उसी समय उसे कृष्ण दिखाई दिये जो अर्जुन के साथ मैदान का निरीक्षण कर रहे थे। वे वहाँ युद्धभूमि का परीक्षण करने आए थे जिससे युद्ध के आरंभ होने से पहले एक विजयी सैन्य रणनीति पर विचार किया जा सके। गौरैया ने कृष्ण के रथ के पास पहुँचने के लिये पूरी शक्ति से अपने पंख फड़फड़ाए।

और भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करने लगी “हे कृष्ण, कृपया मेरे बच्चों की रक्षा कीजिये, कल जब यह युद्ध आरंभ होगा तो यह सब कुचले जाएंगे।

तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा “मैं तुम्हें सुन रहा हूँ जो सर्वज्ञ हैं। किंतु मैं प्रकृति के नियम में बाधा नहीं डाल सकता।

“भगवन मैं केवल इतना जानती हूँ कि आप मुझे बचाने आये हैं। मैं अपने बच्चों का भाग्य आपके हाथों में सौंपती हूँ। आप उन्हें मार सकते हैं या फिर बचा सकते हैं। अब यह आप पर है।”

यह संकेत करते हुए कि वे इस विषय में कुछ भी नहीं कर सकते, कृष्ण ने साधारण मनुष्य की भांति कहा, “समय का पहिया तो बिना विचार किए चलता है”।

“मैं कोई दर्शनशास्त्र नहीं जानती।” गौरैया ने विश्वास एवं श्रद्धा से कहा “आप ही समय का पहिया हैं। मैं तो यही जानती हूँ। मैं आत्मसमर्पण करती हूँ।” तब भगवान ने कहा फिर अपने घोंसले में तीन सप्ताह का भोजन एकत्रित कर लो।”

इस वार्तालाप से अनभिज्ञ अर्जुन उस गौरैया को भगा रहा था। कृष्ण गौरैया को देखकर मुस्कुरा रहे थे। गौरैया ने अभिवादन स्वरूप थोड़ी देर अपने पंख फड़फड़ाए और अपने घोंसले पर वापस आ गई।

दो दिन पश्चात् युद्ध आरंभ की घोषणा हेतु शंखनाद होने से पूर्व कृष्ण ने अर्जुन से उसका धनुष-बाण मांगा।

अर्जुन भौचक्का था क्योंकि कृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली थी। इस के अतिरिक्त अर्जुन को यह विश्वास था कि मैं ही यहाँ सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हूँ।

“आज्ञा दें प्रभु” उसने दृढ़ विश्वास से कहा “मेरे बाणों के लिये कुछ भी अभेद्य नहीं है।”

अर्जुन से चुपचाप धनुष लेते हुए कृष्ण ने एक हाथी पर निशाना साधा। किंतु उस जानवर को मार गिराने के बजाए वह तीर उसके गले में लटकी घंटी पर लगा और चिंगारियाँ निकलीं।

कृष्ण को एक सरल सा निशाना चूकते देख अर्जुन अपनी हंसी रोक न सका।

“क्या, मैं करूँ?” उसने प्रस्ताव किया।
पुनः उसके प्रश्न एवं प्रतिक्रिया को अनदेखा करते हुए कृष्ण ने उसे उसका धनुष वापस कर दिया और कहा कि इसके आगे कुछ और करना आवश्यक नहीं है।

“किंतु केशव, आपने हाथी को क्यों निशाना बनाया?” अर्जुन ने पूछा।

“क्योंकि यही वह हाथी है जिसने उस पेड़ को गिराया था जिस पर उस गौरैया का घोंसला था।”

“कौन सी गौरैया?” अर्जुन ने आश्चर्य प्रकट किया “और वह हाथी तो सकुशल और जीवित है। केवल उसकी घंटी ही गिरी है।” उसके प्रश्न की उपेक्षा करते हुए श्री कृष्ण ने उसे अपना शंख बजाने का आदेश दिया।

युद्ध शुरू हुआ और अगले अठारह दिनों में अनगिनत जीवन नष्ट हो गये। अन्त में पांडवों की विजय हुई। पुनः कृष्ण अर्जुन को लेकर रक्तिम युद्धक्षेत्र का निरीक्षण करने गये। वहाँ कईं शव पड़े थे जिनका अंतिम संस्कार भी नहीं किया गया था। युद्ध-भूमि में कटे हुए सिर, हाथ-पैर, निर्जीव घोड़े व हाथी कूड़े करकट के समान पड़े हुए थे।

कृष्ण एक स्थान पर रुके और हाथी की एक घंटी को विचार मग्न होकर देखने लगे।

उन्होंने कहा “अर्जुन, क्या तुम मेरे लिये इस घंटी को उठाकर दूसरी ओर रख दोगे ?

यद्यपि आदेश सरल था किंतु अर्जुन को तात्पर्य समझ नहीं आया। आखिरकार इस विशाल युद्धक्षेत्र में जहाँ बहुत सी अन्य वस्तुओं को हटाने की आवश्यकता थी, कृष्ण ने उसे एक तुच्छ धातु के टुकड़े को हटाने के लिए क्यों कहा? उसने उन्हें प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।

“हाँ, वह घंटी। यह वही घंटी है जो उस हाथी के गले से तब गिरी थी जब मैंने उस पर तीर चलाया था।”

बिना कोई प्रश्न किये अर्जुन उस भारी घंटी को हटाने के लिये झुका। जैसे ही उसने उसे उठाया उसका संसार सदा के लिये परिवर्तित हो गया।

एक, दो, तीन, चार, पाँच। चार छोटी चिड़िया एक के पीछे एक करके उड़ गयीं और उनके पीछे एक गौरैया थी। माँ चिड़िया कृष्ण के चारों ओर अत्यधिक प्रसन्नता में चक्कर लगाते हुए परिक्रमा करने लगी। वह एक घंटी जो कृष्ण ने अठारह दिनों पूर्व विभाजित की थी उसने चिड़िया के पूरे परिवार की रक्षा की।

“मुझे क्षमा करें कृष्ण” अर्जुन ने कहा “आपको मानव शरीर में साधारण मनुष्यों की भांति व्यवहार करते देख मैं भूल गया था कि आप सचमुच कौन हैं।”

और हम भी अपने ईष्ट अपने भगवान पर उस चिड़िया की तरह भरोसा करें तो हमारे ईष्ट हमारे भगवान भी हर पल हमारे साथ ही हैं,

जरूरत सिर्फ और सिर्फ हमारे विश्वास करने की है!!


🙏🌺हरे कृष्ण🌺🙏*


(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Tuesday, 1 October 2019

राधारानी की कृपा....


श्रीरुप गोस्वामी जी पर राधारानी जी की कृपा 

बरसाना में श्री रुप गोस्वामी , चेतन्य महाप्रभु के छः शिष्यो में से एक., एक बार भ्रमण करते-करते अपने शिष्य श्री जीव गोस्वामी जी के यहाँ बरसाना आए. 

जीव गोस्वामी जी ठहरे फक्कड़ साधू फक्कड़ साधू को जो मिल जाये वो ही खाले जो मिल जाये वो ही पी ले. आज उनके गुरु आए तो उनके मन भाव आया की में रोज सूखी रोटी, पानी में भिगो कर खा लेता हूं. मेरे गुरु आये हैं क्या खिलाऊँ.. 

एक बार अपनी कुटिया में देखा किंचित तीन दिन पुरानी रोटी बिल्कुल कठोर हो चुकी थी, मैं साधू पानी में गला गला खा लूं. यद्यपि मेरे गुरु साधुता की परम स्थिति को प्राप्त कर चुके है फिर भी मेरे मन के आनन्द के लिए, कैसे मेरा मन संतुष्ट होगा.

 एक क्षण के भक्त के मन में सँकल्प आया की अगर समय होता तो किसी बृजवासी के घर चला जाता. दूध मांग लेता, चावल मांग लाता. मेरे गुरु पधारे जो देह के सम्बंध में मेरे चाचा भी लगते हैं. लेकिन भाव साम्रज्य में प्रवेश कराने वाले मेरे गुरु भी तो हैं. उनको खीर खिला देता… 

रूप गोस्वामी ने आकर कहा – जीव भूख लगी है तो जीव गोस्वामी उन सूखी रोटीयो को अपने गुरु को दे रहे है.अँधेरा हो रहा है.जीव गोस्वामी की आँखों में अश्रु आ गए. और रुप गोस्वामी जी ने कहा – तू क्यों रो रहा है हम तो साधू हैं ना. जो मिल जाय वही खा लेते हैं. में खा लूंगा.

 श्री जीव गोस्वामी जी ने कहा- नहीं बाबा मेरा मन नहीं मान रहा.आप की यदि कोई पूर्व सूचना होती तो मेरे मन में कुछ था. यह चर्चा हो ही रही थी की कोई अर्द्धरात्रि में दरवाजा खटखटाता है. ज्यो ही दरवाजा खटखटाया है. जीव गोस्वामी जी ने दरवाजा खोला.

 एक किशोरी खड़ी हुई है 8 -10 वर्ष की हाथ में कटोरा है. कहा, बाबा मेरी माँ ने खीर बनाई है और कहा जाओ बाबा को दे आओ. जीव गोस्वामी ने उस खीर के कटोरे को ले जाकर रुप गोस्वामी जी के पास रख दिया. 

बोले बाबा – पाओ…ज्यों ही रूप गोस्वामी जी ने उस खीर को स्पर्श किया… उनका हाथ कांपने लगा. जीव गोस्वामी को लगा बाबा का हाथ कांप रहा है. पूछा – बाबा कोई अपराध बन गया है ? 

रूप गोस्वामी जी ने पूछा-  जीव! आधी रात को यह खीर कौन लाया…?? 

बाबा पड़ोस में एक कन्या है मैं जानता हूं उसे, वो लेके आई है.नहीं जीव इस खीर को मैने जैसे ही चख के देखा और मेरे में ऐसे रोमांच हो गया. नहीं जीव् तू पता कर यह कन्या मुझे मेरे किशोरी जी के होने अहसास दिला रही है.

 नहीं बाबा,  वह कन्या पास की है, मैं जानता हूं उसको. अर्ध रात्रि में दोनों गए है उस के घर और दरवाजा खटखटाया, अंदर से उस कन्या की माँ निकल कर बाहर आई. जीव गोस्वामी जी ने पूछा – आपको कष्ट दिया, परन्तु आपकी लड़की कहां है ? 

उस महिला ने कहा, – का बात है गई बाबा.. आपकी लड़की है कहाँ…??

 वो तो उसके ननिहाल गई है गोवेर्धन, 15 दिन हो गए हैं. रूप गोस्वामी जी तो मूर्छित हो गए. जीव गोस्वामी जी ने पैर पकडे और जैसे तेसे श्रीजी के मंदिर की सीढ़िया चढ़ने लगे.  जैसे एक क्षण में चढ़ जायें.

 लंबे-लंबे पग भरते हुए मंदिर पहुचे. वहां श्री गोसाई जी से कहा-  बाबा! एक बात बताओ आज क्या भोग लगाया था श्रीजी श्यामा प्यारी को ? गोसांई जी जानते थे श्री जीव गोस्वामी को, कहा क्या बात है गई बाबा…कहा क्या भोग लगाया था… गोसाई जी ने कहा, आज श्रीजी को खीर का भोग लगाया था. 

रूप गोस्वामी तो श्री राधे श्री राधे कहने लगे, उन्होंने गोसाई जी से कहा – बाबा एक निवेदन और है आप से, यद्दपि यह मंदिर की परंपरा के विरुद्ध है कि एक बार जब श्री जी को शयन करा दिया जाये तो उनकी लीला में जाना अपराध है.

 प्रिया प्रियतम जब विराज रहे हों तो नित्य लीला है उनकी,अपराध है फिर भी आप एक बार यह बता दीजिये की जिस पात्र में भोग लगाया था वह पात्र रखो है के नहीं रखो है…गोसाई जी मंदिर के पट खोलते हैं और देखते हैं की वह पात्र नहीं है वहां पर. गोसांई जी बाहर आते हैं और कहते हैं – बाबा ! वह पात्र नहीं है वहां पर ! न जाने का बात है गई है…

रूप गोस्वामी जी ने अपना दुप्पटा हटाया और वह चाँदी का पात्र दिखाया, बाबा यह पात्र तो नहीं है ?

 गोसांई जी ने कहा – हां बाबा यही पात्र तो है… रूप गोस्वामी जी ने कहा- श्री राधा रानी 300 सीढ़ी उतरकर मुझे खीर खिलाने आई, किशोरी पधारी थी, राधारानी आई थी. उस खीर को मुख पर रगड़ लिया सब साधु संतो को बांटते हुए श्री राधे श्री राधे करते हुऐ फिर कई वर्षो तक श्री रूप गोस्वामी जी बरसाना में ही रहे.

 हे करुणा निधान ! इस अधम, पतित-दास को ऐसी पात्रता और ऐसी उत्कंठा अवश्य दे देना कि इन रसिकों के गहन चरित का आस्वादन कर अपने को कृतार्थ कर सकूँ। इनकी पद धूलि की एक कनिका प्राप्त कर सकूँ.

जय जय श्रीराधे...