Monday, 25 May 2020

"कर्मफल"

महाभारत युद्ध समाप्त हुआ और भगवान श्रीकृष्ण द्वारिकापुरी वापस लौटे..। पटरानी रुक्मणी उनके निकट आईं और कहा…

'हे कृष्ण! मेरे मन में एक बात खटक रही है, जो आपको बता कर उसका समाधान करना चाहती हूं।'

श्रीकृष्ण के संकेत पर उन्होंने पुछा - 'महादानी कर्ण का ऐसा अंत क्यों ??' 
'एक श्रेष्ठ मित्र, महापराक्रमी और महादानेश्वर, ऐसा क्या दोष था उसका ??'
'जिसने स्वयं की माता कुंती को भी अर्जुन के सिवा किसी अन्य पांडव को नहीं मारने का वचन दिया था।'
'अपने कवच और कुंडल जानते बूझते भी ब्राह्मण वेशधारी इंद्र को दान में दे दिए थे..
ऐसे महान दानदाता ने अपने किस कर्म का फल भोगा ??'

तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके प्रश्न में निहित उनकी शंका के समाधान हेतु बताया कि…

'हे महारानी! महाभारत युद्ध में जब सात सात महारथियों के सामने अकेले युद्ध करता महावीर अभिमन्यु… युद्ध भूमि में धराशाई हो गया था…. और अपनी आसन्न मृत्यु के द्वार पर खड़ा था...तब उसने युद्ध भूमि में अपने समीप खड़े कर्ण से अपनी क्षुधा पूर्ति हेतु जल की याचना इस विश्वास से की थी कि यद्यपि वह शत्रु पक्ष का है तथापि महादानेश्वर होने के कारण, वह कर्ण उसकी क्षुधा को शांत करने हेतु जल अवश्य देगा।

किंतु, अपने स्वयं के पास मीठा पेयजल होने के बाद भी, मात्र इसलिए कि ऐसा करने से उसका प्रिय मित्र दुर्योधन रुष्ट हो जाएगा,  कर्ण ने उस मृत्यु द्वार पर खड़े याचक की याचना की अवहेलना की थी और …युद्ध भूमि में उस बालक को अपने सूखे कंठ लिए प्राण त्यागना पड़ा।

हे रुक्मणी। कर्ण के इस एकमात्र पाप ने उसके संपूर्ण जीवन में किए दानों से अर्जित पुण्यों को नष्ट कर दिया, यह एकमात्र कारण प्रर्याप्त था, उसके पुण्यों की यशस्वी गाथा का क्षय करने हेतु।

और…काल की गति देखिए … उसी जल के स्रोत से उत्पन्न किचड़ में … कर्ण के रथ का पहिया धंस जाता है और… उस महारथी, महादानी और महापराक्रमी कर्ण के अंत का... उसकी मृत्यु का कारण बन जाता है। यही है 'कर्मफल'....

 कर्म का शाश्वत 'सिद्धांत' -

'किसी के साथ किए अन्याय का एक ही पल... आपके संपूर्ण जीवन की प्रामाणिकता को शून्य करने हेतु प्रर्याप्त है !!'

अत: ध्यान देंवें.........'हम में से प्रत्येक को अपने किए कर्मों का फल यहीं इसी जीवन में, और इसी पृथ्वी पर भोगना है।'

'किसी की भावना और विश्वास को तोड़ना सबसे बड़ा पाप है, विशेषकर ऐसे व्यक्ति का जिसने आप पर आंख मूंद कर विश्वास किया हो !!


*🙏|| जय श्री कृष्ण: ||🙏



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Tuesday, 12 May 2020

महाभारत का चीर-हरण प्रसङ्ग ।


महाभारत एक पूर्ण न्यायशास्त्र है, और चीर-हरण उसका केन्द्रबिन्दु ! इस प्रसङ्ग के बाद की पूरी कथा इस घिनौने अपराध के अपराधियों को मिले दण्ड की कथा है। वह दण्ड, जिसे निर्धारित किया भगवान श्रीकृष्ण ने और किसी को नहीं छोड़ा... किसी को भी नहीं ।

दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दुशासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी। महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया।

भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखे... भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जबतक सब देख नहीं लिया, तबतक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था।  

धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका।
 
दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला। द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप उनका अपमान देखते रहे, तो सबसे कठोर दण्ड भी उन्ही को मिला। अर्जुन पितामह भीष्म को सबसे अधिक प्रेम करते थे, तो कृष्ण ने उन्ही के हाथों पितामह को निर्मम मृत्यु दिलाई। अर्जुन रोते रहे, पर तीर चलाते रहे... क्या लगता है, अपने ही हाथों अपने अभिभावकों, भाइयों की हत्या करने की ग्लानि से अर्जुन कभी मुक्त हुए होंगे क्या ?  नहीं... वे जीवन भर तड़पे होंगे। यही उनका दण्ड था।

युधिष्ठिर ने स्त्री को दाव पर लगाया, तो उन्हें भी दण्ड मिला। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ने वाले युधिष्ठिर ने युद्धभूमि में झूठ बोला, और उसी झूठ के कारण उनके गुरु की हत्या हुई। यह एक झूठ उनके सारे सत्यों पर भारी रहा... धर्मराज के लिए इससे बड़ा दण्ड क्या होगा ?

दुर्योधन को गदायुद्ध सिखाया था स्वयं बलराम ने। एक अधर्मी को गदायुद्ध की शिक्षा देने का दण्ड बलराम को भी मिला। उनके सामने उनके प्रिय दुर्योधन का वध हुआ और वे चाह कर भी कुछ न कर सके... 

उस युग में दो योद्धा ऐसे थे जो अकेले सबको दण्ड दे सकते थे, कृष्ण और बर्बरीक। पर कृष्ण ने ऐसे कुकर्मियों के विरुद्ध शस्त्र उठाने तक से इनकार कर दिया, और बर्बरीक को युद्ध मे उतरने से ही रोक दिया। लोग पूछते हैं कि बर्बरीक का वध क्यों हुआ ?  यदि बर्बरीक का बध नहीं हुआ होता तो द्रौपदी के अपराधियों को यथोचित दण्ड नहीं मिल पाता। कृष्ण युद्धभूमि में विजय और पराजय तय करने के लिए नहीं उतरे थे, कृष्ण कृष्णा (द्रौपदी) के अपराधियों को दण्ड दिलाने उतरे थे।

कुछ लोगों ने कर्ण का बड़ा महिमामण्डन किया है। पर सुनिए ! कर्ण कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न रहा हो, कितना भी बड़ा दानी क्यों न रहा हो, एक स्त्री के वस्त्र-हरण में सहयोग का पाप इतना बड़ा है कि उसके समक्ष सारे पुण्य छोटे पड़ जाएंगे। द्रौपदी के अपमान में किये गए सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि वह महानीच व्यक्ति था, और उसका वध ही धर्म था।

स्त्री कोई वस्तु नहीं कि उसे दाव पर लगाया जाय। कृष्ण के युग में दो स्त्रियों को बाल से पकड़ कर घसीटा गया।  देवकी का बाल पकड़ा कंस ने, और द्रौपदी का बाल पकड़ा दुशासन ने। श्रीकृष्ण ने स्वयं दोनों के अपराधियों का समूल नाश किया। किसी स्त्री के अपमान का दण्ड  अपराधी के समूल नाश से ही पूरा होता है,... यही न्याय है, यही धर्म है। और इस धर्म को स्थापित करने वाला भारत है, सनातन है...

🕉 जय श्रीकृष्ण 🕉

Wednesday, 6 May 2020

🦆 गौरैया का विश्वास 🦆

कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र को विशाल सेनाओं के आवागमन की सुविधा के लिए तैयार किया जा रहा था। उन्होंने हाथियों का इस्तेमाल पेड़ों को उखाड़ने और जमीन साफ करने के लिए किया। ऐसे ही एक पेड़ पर एक गौरैया अपने चार बच्चों के साथ रहती थी। जब उस पेड़ को उखाड़ा जा रहा था तो उसका घोंसला जमीन पर गिर गया, लेकिन चमत्कारी रूप से उसकी संताने अनहोनी से बच गई। लेकिन वो अभी बहुत छोटे होने के कारण उड़ने में असमर्थ थे।

कमजोर और भयभीत गौरैया मदद के लिए इधर-उधर देखती रही। तभी उसने कृष्ण को अर्जुन के साथ वहा आते देखा। वे युद्ध के मैदान की  जांच करने और युद्ध की शुरुआत से पहले जीतने की रणनीति तैयार करने के लिए वहां गए थे।

उसने कृष्ण के रथ तक पहुँचने के लिए अपने छोटे पंख फड़फड़ाए और किसी प्रकार श्री कृष्ण के पास पहुंची।

"हे कृष्ण, कृपया मेरे बच्चों को बचाये क्योकि लड़ाई शुरू होने पर कल उन्हें कुचल दिया जायेगा।"

सर्व व्यापी भगवन बोले "मैं तुम्हारी बात सुन रहा हूं, लेकिन मैं प्रकृति के कानून में हस्तक्षेप नहीं कर सकता। "

गौरैया ने कहा "हे भगवान ! मै जानती हूँ कि आप मेरे उद्धारकर्ता हैं, मैं अपने बच्चों के भाग्य को आपके  हाथों में सौंपती  हूं। अब यह आपके ऊपर है कि आप उन्हें मारते हैं या उन्हें बचाते हैं"

काल चक्र पर किसी का बस  नहीं  है l श्री कृष्ण ने एक साधारण व्यक्ति की तरह उससे बात की जिसका आशय था कि वहा ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके बारे में वो कुछ भी कर सकते  थे।

गौरैया ने विश्वास और श्रद्धा के साथ कहा "प्रभु, आप कैसे और क्या करते  है वो मै नहीं जान सकती,"। "आप स्वयं काल के नियंता हैं, यह मुझे पता है। मैं सारी स्थिति एवं परिस्थति एवं स्वयं को परिवार सहित आपको समर्पण करती  हूं।"

भगवन बोले "अपने घोंसले में तीन सप्ताह के लिए भोजन का संग्रह करो।"

गौरैया और श्री कृष्ण के सवाद से अनभिज्ञ, अर्जुन गौरैया को दूर भगाने की कोशिश करते है।

गौरैया ने अपने पंखों को कुछ मिनटों के लिए फुलाया और फिर अपने घोंसले में वापस चली गई।

दो दिन बाद, शंख के उद् घोष से युद्ध शुरू होने की घोषणा की गई।

कृष्ण ने अर्जुन से कहा की अपने धनुष और बाण मुझे दो। अर्जुन चौंका क्योंकि कृष्ण ने युद्ध में कोई भी हथियार नहीं उठाने की शपथ ली थी।  इसके अतिरिक्त, अर्जुन का मानना था कि वह ही सबसे अच्छा धनुर्धर है।

"मुझे आज्ञा दें, भगवान,"अर्जुन ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा, मेरे तीरों के लिए कुछ भी अभेद्य नहीं है।

चुपचाप अर्जुन से धनुष लेकर कृष्ण ने एक हाथी को निशाना बनाया। लेकिन, हाथी को मार के नीचे गिराने के बजाय, तीर  हाथी के गले की घंटी में जा टकराया और एक चिंगारी सी  उड़ गई।

अर्जुन ये देख कर अपनी हसी  नहीं रोक पाया  कि कृष्ण एक आसान सा निशान चूक गए।

"क्या मैं प्रयास करू?" उसने स्वयं को प्रस्तुत किया।

उसकी प्रतिक्रिया को नजरअंदाज करते हुए, कृष्ण ने उन्हें धनुष वापस दिया और कहा कि कोई और कार्रवाई आवश्यक नहीं है।

“लेकिन केशव तुमने हाथी को क्यों तीर मारा? अर्जुन ने पूछा।

"क्योंकि इस हाथी ने उस गौरैया के आश्रय उसके घोंसले को जो कि एक पेड़ पर था उसको गिरा दिया था।"

"कौन सी गौरैया?" अर्जुन ने पूछा। "इसके अतिरिक्त, हाथी तो अभी स्वस्थ और जीवित है। केवल घंटी ही टूट कर गिरी  है!"

अर्जुन के सवालों को खारिज करते हुए, कृष्ण ने उसे शंख फूंकने का निर्देश दिया।

युद्ध शुरू हुआ, अगले अठारह दिनों में कई जानें चली गईं। अंत में पांडवों की जीत हुई। एक बार फिर, कृष्ण अर्जुन को अपने साथ सुदूर क्षेत्र में भ्रमण करने के लिए ले गए। कई शव अभी भी वहाँ हैं जो उनके अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहे हैं। जंग का मैदान गंभीर अंगों और सिर, बेजान सीढ़ियों और हाथियों से अटा पड़ा था।

कृष्ण एक निश्चित स्थान पर रुके और एक घंटी जो कि  हाथी पर बाँधी जाती थी उसे देख कर विचार करने लगे ।

"अर्जुन," उन्होंने कहा, "क्या आप मेरे लिए यह घंटी उठाएंगे और इसे एक तरफ रख देंगे?"

निर्देश बिलकुल सरल था परन्तु अर्जुन के समझ में नहीं आया। आख़िरकार, विशाल मैदान में जहाँ बहुत सी अन्य चीज़ों को साफ़ करने की ज़रूरत थी, कृष्ण उसे धातु के एक टुकड़े को रास्ते से हटाने के लिए क्यों कहेंगे? उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा।

"हाँ, यह घंटी," कृष्ण ने दोहराया। "यह वही घंटी है जो हाथी की गर्दन पर पड़ी थी जिस पर मैंने तीर मारा था। "

अर्जुन बिना किसी और सवाल के भारी घंटी उठाने के लिए नीचे झुका। जैसे ही उन्होंने इसे उठाया, , उसकी हमेशा के लिए जैसे दुनिया बदल गई।

एक, दो, तीन, चार और पांच। चार युवा पक्षियों और उसके बाद एक गौरैया उस घंटी के नीचे से निकले । बाहर निकल के माँ और छोटे पक्षी कृष्ण के इर्द-गिर्द मंडराने लगे एवं  बड़े आनंद से उनकी परिक्रमा करने लगे। अठारह दिन पहले काटी गई एक घंटी ने पूरे परिवार की रक्षा की थी।

"मुझे क्षमा करें हे कृष्ण, अर्जुन ने कहा,"आपको मानव शरीर में देखकर और सामान्य मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हुए, मैं भूल गया था कि आप वास्तव में कौन हैं। "

आवश्यकता विश्वास एवम् समर्पण की है।

 🙏 जय श्री कृष्ण  राधे राधे 🙏


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Wednesday, 8 April 2020

" भक्ति का वरदान "

🙏 ।। जै श्रीराम ।। 🙏

महायुद्ध समाप्त हो चुका था। जगत को त्रास देने वाला रावण अपने कुटुंब सहित नष्ट हो चुका था। कौशलाधीश राम के नेतृत्व में चहुँओर शांति थी। 

राम का राज्याभिषेक हुआ। राजा राम ने सभी वानर और राक्षस मित्रों को ससम्मान विदा किया। अंगद को विदा करते समय राम रो पड़े थे। हनुमान को विदा करने की शक्ति तो श्रीराम में भी नहीं थी। माता सीता भी उन्हें पुत्रवत मानती थी। हनुमान अयोध्या में ही रह गए। 

राम दिन भर दरबार में, शासन व्यवस्था में व्यस्त रहे। सन्धा जब शासकीय कार्यों से छूट मिली तो गुरु और माताओं का कुशलक्षेम पूछ अपने कक्ष में आए। हनुमान उनके पीछे-पीछे ही थे। राम के निजी कक्ष में उनके सारे अनुज अपनी-अपनी पत्नियों के साथ उपस्थित थे। वनवास, युद्ध, और फिर अंनत औपचारिकताओं के पश्चात यह प्रथम अवसर था जब पूरा परिवार एक साथ उपस्थित था। राम, सीता और लक्ष्मण को तो नहीं, कदाचित अन्य वधुओं को एक बाहरी, अर्थात हनुमान का वहाँ होना अनुचित प्रतीत हो रहा था। चूंकि शत्रुघ्न सबसे छोटे थे, अतः वे ही अपनी भाभियों और अपनी पत्नी की इच्छापूर्ति हेतु संकेतों में ही हनुमान को कक्ष से जाने के लिए कह रहे थे। पर आश्चर्य की बात कि हनुमान जैसा ज्ञाता भी यह मामूली संकेत समझने में असमर्थ हो रहा था। 

अस्तु, उनकी उपस्थिति में ही बहुत देर तक सारे परिवार ने जी भर कर बातें की। फिर भरत को ध्यान आया कि भैया-भाभी को भी एकांत मिलना चाहिए। उर्मिला को देख उनके मन में हूक उठती थी। इस पतिव्रता को भी अपने पति का सानिध्य चाहिए। अतः उन्होंने राम से आज्ञा ली, और सबको जाकर विश्राम करने की सलाह दी। सब उठे और राम-जानकी का चरणस्पर्श कर जाने को हुए। परन्तु हनुमान वहीं बैठे रहे। उन्हें देख अन्य सभी उनके उठने की प्रतीक्षा करने लगे कि सब साथ ही निकले बाहर। 

राम ने मुस्कुराते हुए हनुमान से पूछा, "क्यों वीर, तुम भी जाओ। तनिक विश्राम कर लो।"

हनुमान बोले, "प्रभु, आप सम्मुख हैं, इससे अधिक विश्रामदायक भला कुछ हो सकता है? मैं तो आपको छोड़कर नहीं जाने वाला।"

शत्रुघ्न तनिक क्रोध से बोले, "परन्तु भैया को विश्राम की आवश्यकता है कपीश्वर! उन्हें एकांत चाहिए।"

"हाँ तो मैं कौन सा प्रभु के विश्राम में बाधा डालता हूँ। मैं तो यहाँ पैताने बैठा हूँ।"

"आपने कदाचित सुना नहीं। भैया को एकांत की आवश्यकता है।"

"पर माता सीता तो यहीं हैं। वे भी तो नहीं जा रही। फिर मुझे ही क्यों निकालना चाहते हैं आप?"

"भाभी को भैया के एकांत में भी साथ रहने का अधिकार प्राप्त है। क्या उनके माथे पर आपको सिंदूर नहीं दिखता ?

हनुमान आश्चर्यचकित रह गए। प्रभु श्रीराम से बोले, "प्रभु, क्या यह सिंदूर लगाने से किसी को आपके निकट रहने का अधिकार प्राप्त हो जाता है ?"

राम मुस्कुराते हुए बोले, "अवश्य। यह तो सनातन प्रथा है हनुमान।"

यह सुन हनुमान तनिक मायूस होते हुए उठे और राम-जानकी को प्रणाम कर बाहर चले गए। 
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प्रातः राजा राम का दरबार लगा था। साधारण औपचारिक कार्य हो रहे थे कि नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी न्याय मांगते दरबार में उपस्थित हुए। ज्ञात हुआ कि पूरी अयोध्या में रात भर व्यापारियों के भंडारों को तोड़-तोड़ कर हनुमान उत्पात मचाते रहे थे। राम ने यह सब सुना और सैनिकों को आदेश दिया कि हुनमान को राजसभा में उपस्थित किया जाए। रामाज्ञा का पालन करने सैनिक अभी निकले भी नहीं थे कि केसरिया रंग में रंगे-पुते हनुमान अपनी चौड़ी मुस्कान और हाथी जैसी मस्त चाल से चलते हुए सभा में उपस्थित हुए। उनका पूरा शरीर सिंदूर से पटा हुआ था। एक-एक पग धरने पर उनके शरीर से एक-एक सेर सिंदूर भूमि पर गिर जाता। उनकी चाल के साथ पीछे की ओर वायु के साथ सिंदूर उड़ता रहता। 

राम के निकट आकर उन्होंने प्रणाम किया। अभी तक सन्न होकर देखती सभा, एकाएक जोर से हँसने लगी। अंततः बंदर ने बंदरों वाला ही काम किया। अपनी हँसी रोकते हुए सौमित्र लक्ष्मण बोले, "यह क्या किया कपिश्रेष्ठ? यह सिंदूर से स्नान क्यों? क्या यह आप वानरों की कोई प्रथा है ?"

हनुमान प्रफुल्लित स्वर में बोले, "अरे नहीं भैया। यह तो आर्यों की प्रथा है। मुझे कल ही पता चला कि अगर एक चुटकी सिंदूर लगा लो तो प्रभु राम के निकट रहने का अधिकार मिल जाता है। तो मैंने सारी अयोध्या का सिंदूर लगा लिया। क्यों प्रभु, अब तो कोई मुझे आपसे दूर नहीं कर पाएगा न ?"

सारी सभा हँस रही थी। और भरत हाथ जोड़े अश्रु बहा रहे थे। यह देख शत्रुघ्न बोले, "भैया, सब हँस रहे हैं और आप रो रहे हैं ? क्या हुआ ?" 

भरत स्वयं को सम्भालते हुए बोले, "अनुज, तुम देख नहीं रहे ! वानरों का एक श्रेष्ठ नेता, वानरराज का सबसे विद्वान मंत्री, कदाचित सम्पूर्ण मानवजाति का सर्वश्रेष्ठ वीर, सभी सिद्धियों, सभी निधियों का स्वामी, वेद पारंगत, शास्त्र मर्मज्ञ यह कपिश्रेष्ठ अपना सारा गर्व, सारा ज्ञान भूल कैसे रामभक्ति में लीन है। राम की निकटता प्राप्त करने की कैसी उत्कंठ इच्छा, जो यह स्वयं को भूल चुका है। ऐसी भक्ति का वरदान कदाचित ब्रह्मा भी किसी को न दे पाएं। मुझ भरत को राम का अनुज मान भले कोई याद कर ले, पर इस भक्त शिरोमणि हनुमान को संसार कभी भूल नहीं पाएगा। हनुमान को बारम्बार प्रणाम।"

🙏 ।। जै श्रीराम ।। 🙏


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Sunday, 29 March 2020

भगवान विट्टलनाथ जी के परम भक्त संत तुकाराम जी !

⚘ जय श्री राधे  ⚘

तुकाराम जी भगवान विट्टलनाथ जी के परम भक्त थे उनका जन्म पूना जिले में हुआ था । उनके माता-पिता के बडे ही लाडले बेटे थे, पर अठारह वर्ष की आयु में इनके माता-पिता का स्वर्ग वास हो गया और कहते है कि भक्त जब भक्ति के मार्ग पर जाता है. तो परमात्मा सारे विघ्नों को हटा देते है।

माता पिता के मरने के बाद इनके गाँव में ऐसा अकाल पडा कि इनकी पत्नि और बच्चे भूख से मर गए और तुकाराम जी उन्हें बचा नहीं सके, एक के बाद एक ऐसी विपत्तियाँ आई कि मन संसार से हट गया और परमात्मा में लगने लगा, और रहा बचा हुआ तो मन संसार में लगा था ।

वो इनकी दूसरी पत्नी ने हटा दिया. इनका दूसरा विवाह जीजा बाई के साथ हुआ। कहीं-कहीं ऐसा आता है कि जीजाबाई स्वभाव की कर्कसा थी और तुकाराम जी एकदम विरक्त थे। चित्त सदा शांत रहता था और विट्टलनाथ जी का स्मरण करते थे और अपना जीवन व्यतीत करते थे पर ये बात जीजाबाई केा अच्छी नहीं लगती थी।

संसार से वैराग्य

प्रसंग 1 - एक दिन तुकाराम जी के सपने में संत आए और तुकाराम जी को  “राम-कृष्ण-हरि विट्ठल"  का मंत्र दे दिया। इसके बाद मानो वैराग्य और पक्का हो गया लेकिन अभी मोह संसार से था। उनकी पत्नी इनका विरक्त स्वभाव अच्छा लगता नहीं है। एक बार किसी बात को लेकर पत्नी ने गुस्से में आकर गन्ना तुकाराम जी की पीठ पर दे मारा, तो गन्ने के दो टूकडे हो गए।
तो तुकाराम जी ने कहा - कि अच्छा हुआ जो तूने ही इसे बाँट दिया, उन्हें इस बात से वैराग्य हुआ, वास्तव में इस संसार में प्रीति रखने का काम नहीं और विरक्त हो गए और दिन रात विट्ठलनाथ जी भक्ति में डूब गए।

 तो अंदर से प्रेरणा हुई कि कुछ लिखा जाए तो उन्होंनें  “अभग”  लिखे। जिसमें वेद की वाणी, गीता, रामायण का सार था। जिनको वह वाणी बड़ी अच्छी लगी. लोगों को उसमें जीवन में की सच्चाई दिखी, तो लोग बडी प्रशंसा करने लगे।

जब उनकी कीर्ति फैलने लगी, जब अच्छा काम करो तो लोग आलोचना ना करें तो ऐसा तो हो ही नहीं सकता।लेकिन तुकाराम जी का भाव तो यहीं था  कि परमात्मा ने जो वाणी मुझे दी है उससे ना सिर्फ मेरा बल्कि पूरी जनता का उद्धार हो।  वास्तव में एक संत का काम ऐसा ही होता है। वह केवल अपने लिए नहीं जीता v
उन्होंने सोचा लोगों को भी ये चीज पता चलनी चाहिए, तो लोक उद्धार के लिए उनके मन में कविता के रूप में वो अपने आप वाणी आ गई।

तुकाराम जी का अभग लिखना

प्रसंग 2- जब एक बार अनंदी नामक ग्राम में थे और कीर्तन कर रहे थे, वहीं पर अभग सुना रहे थे। वहीं पर रामेश्वर शास्त्री नामक के एक व्यक्ति ने देखा कि इनकी वाणी में श्रीमदभागवत, गीता और भागवत का सार है।
ये वाणी तो साक्षात वेद की है और तुकाराम जी अपने मुख से गा रहे है,  तो वो गुस्से से तुकाराम जी के पास गए.
और बोले - कि तुम्हारी वाणी में तो वेदार्थ है, और तुम तो शूद्र हो, शास्त्रों में ऐसा लिखा है कि शूद्र इसे नहीं पढ सकते है, वर्जित है। शूद्र के लिए तुम्हारी वाणी जो भी ये सुनेगा तो अधर्म हो जाएगा तुमसे ये किसने कहा कि तुम वेदवाणी कहो।

तो तुकाराम जी बोले – भैया ! ये मेरी वाणी नहीं ये तो देववाणी है, और साक्षात पाडुंरगा स्वामी मेरे विट्ठल नाथ जी ने मुझे इसे कहने का आदेश दिया है, पर वो पंडित भी कहाँ शांत बैठने वाला था, क्योंकि जलन जब मन में आती है तो व्यक्ति बहुत निकृष्ट काम करता है। यहीं उस रामेश्वर पंडित ने किया। 

वो चाहता था कि इनकी सारी रचनाँए जो इन्होने लिखी है, वो पानी में फेंक दी जाए। इसलिए उसने गाव के मुखिया को भडकाया और कहा कि देखो ये तुकाराम शूद्र जाति का होके कितना अधर्म कर रहा है। और सारे गाँव वालों को ही भडकाया।

तो तुकाराम जी के अभग को नदी में पत्थर बाँधकर फेंक दिया ताकि अभग तैरकर ऊपर न आ सके, तुकाराम जी को बहुत दुखा हुआ और वे उसी इन्द्राणी नदी के किनारे एक पत्थर पर तेरह दिन तब बैठ रहे।  पर कुछ नहीं हुआ.

जब अभग पानी में तैरने लगे

एक फकीर के श्राप से रामेश्वर शास्त्री के बदन में बहुत दाह ताप हुआ बहुत प्रयत्न करने पर भी ताप शांत नहीं हुआ। और इधर तुकाराम जी के सपने में बिठठल नाथ जी आए और कहा - कि देखो नदी की तरफ, मैने तेरह दिन तक तुम्हारे अभग की रक्षा की है कल वो नदी में तैरेंगे. और यहीं स्वप्न विट्ठलनाथ ने पूरे गाँवों वालों को दिया।

ये चमत्कार नहीं था बल्कि ये दृढ संकल्प था तुकाराम जी का, कि वो विनती जरूर सुनेंगे।  उनकी ही कृपा से मैने अभग लिखे, और काव्यों में उनको गाया। ये दृढ विश्वास ही परमात्मा तक पुहॅचा देता है। और अगले दिन जब सारे गाँव वाले नदी के किनारे पहुचे, तो देखा कि अभग पानी पर तैर रहा है।

सबने वे अभग उठाए और देखा कि पानी की एक भी बूदॅ अभग पर नहीं है, बडे प्रसन्न हुए। सारे लोग तुकाराम जी के चरणों में गिर पडे और बोले कि हमें माफ कर दो साक्षात परमात्मा ने हमें सपने में आकर दर्शन दिए।

और वहाँ पर जब रामेश्वर पंडित का दाह शांत नहीं हुआ, तो भगवान ने उसे सपने में कहा - कि तुमने तुकाराम जैसे सतं का अपमान किया हैं संत तो संत होता है, उसकी कोई जाति नहीं होती है। और तुकाराम जी तो बहुत बडे संत है। वो चाहते तो ये ज्ञान अपने तक सीमित रखते पर उन्होंने इसे जनसाधारण में दिया और आपने उनका अपमान किया और सारे गाँव वालों को भडकाया इसीलिए आपकी यहीं सजा है, आपके सारे शरीर में दाह होती रहेगी। तो रामेश्वर जी बोले – प्रभु! मुझसे भूल हो गई क्षमा करो,

तो भगवान बोले - कि तुमने मेरा अपराध किया होता तो मैं क्षमा कर देता पर तुमने मेंरे भक्त का अपमान किया है। अगर तुम तुकाराम जी की शरण में जाओगे वे तुम्हें माफ कर देंगे तो हम भी तुम्हें माफ कर देंगे।

जब तुकाराम जी को ये समाचार मिला तो जो अभग उन्होंने लिखे थे उनमें से एक अभग लिखकर रामेश्वर जी के पास भिजवा दिया। और कहा कि आप की कोई गलती नहीं है। और जब रामेश्वरजी ने वो अभग पडा तो पढते ही उनका दाह शांत हो गयाv

जब रामेश्वर जी वापिस देहू गाँव में आए तो तुकाराम जी से माफी मागने लगे और उनके कीर्तन में गाने लगे।क्योंकि संत कभी किसी का बुरा नहीं करते करते है कि एक पल का सतसंग व्यक्ति का जीवन बना देता है।

और एक पल का कुसंग व्यक्ति का जीवन बर्बाद कर देता है। तो रामेश्वरजी तुकाराम जी की सभा में कीर्तन करने लगे। और जिस फकीर ने रामेश्वर जी को श्राप दिया था उसे पता चला कि तुकाराम जी ने मेरा श्राप विफल कर दिया, तो वो गुस्से में तुकाराम जी के घर आ गया।

अब देखने में वो फकीर थे, तो उस समय घर में तुकाराम जी की बेटी थी, तो उसने एक चुटकी आटा उनकी झोली में डाला तो वो लबालब भर गया और आटा गिरने लगा।  जो ये चमत्कार देखा तो वो समझ गए कि ये केाई साधारण संत नहीं है, सिद्धि भी चली गई, इनके आगें कुछ नहीं कर सके, और ये भी तुकाराम जी के सान्ध्यि में आ गए और उनके साथ रहने लगे।

जब तुकाराम जी में हुए विट्ठलनाथ जी के दर्शन

प्रसंग 3- जब ये एक बार अपने ननीहाल में गए तो वहा पर भी ये संकीर्तन करने लगें। क्योंकि इनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। तो जब सबने कहा - कि कीर्तन करो तो जब ये कीर्तन करने लगे दो युवक बाह्रमण थे, वो भी इनके कीर्तन में आ गए और देखने लगे कि यहाँ पर तो चाहे स्त्री हो, पूरूष, शूद् हो, चाहे कोई छोटा हो चाहे कोई बड़ा हो, कोई भी जाति हो, सब कुछ भूलकर इतनी विषमताओं को हटाकर सब इसका कीर्तन कर रहें है औह बाह्रमण भी इस शूद्र के साथ कीर्तन कर रहे है, और अपना धर्म च्युत कर रहे है।

पर कोरी पंडिताई किस काम की जिसमें भक्तिी भाव ना हो, भगवान तो पंडिताई से नहीं भक्तिी से प्रसन्न होते है।अब तो उन दोंनों को बडा गुस्सा आया और वे दूत देवजी दादा जो गाँव के प्रमुख थे, के पास जाकर बोले - कि देखो ! कैसा समय आ गया लोगा अपने बाह्रमण धर्म को त्याग का एक शूद्र के चरणों में बैठे है जप कर रहे है। 

आप इस अधर्म का नाश करो, तो दादू जी उनकी बात में आ गए कि तुम लोग सहीं कह रहे हो शूद्र कीर्तन करवा रहे है। तो वहाँ पहुँच गए जहाँ तुकाराम जी कीर्तन कर रहे थे और उन्होंने देखा बूढे, बच्चे, और हर जाति के लोग एक साथ बैठे थे। सब मस्त होकर भजन में तो दादू जी भी कीर्तन में बैठ गए और सोचा कीर्तन के बाद में देंखेंगे।

तो भगवान की कृपा देखो जब दादू जी ने तुकाराम जी की ओर देखा तो सब भूल गए और जब बाद में उन दोंनों ने दादू जी से कहा कि आपने तुकाराम का कीर्तन बंद क्यों नहीं करवाया तो वो बोले - कि मुझे तो यहाँ पर केाई तुकाराम नहीं दिखा।

मेंरे सामने तो साक्षात विट्ठलनाथ जी कीर्तन करवा रहे थे। मैनें यहाँ तुकाराम को नहीं देखा मुझे तो लगा विट्ठल नाथ जी कीर्तन करवा रहे है। और मैं उनकेा कैसे रोक सकता हूँ , और उन दोंनों को गाँव से निकाल दिया कि जिसके अंदर भक्तिी नहीं है।

और तुकाराम जी से कहा - प्रभु ! आप धन्य हो, कि एक भक्त के रूप में आपने मुझे दर्शन दिए। तो इस तरह तुकाराम जी ने अपने अभग से कीर्तन से करोडों लोगों का उद्धार किया और परमात्मा की ओर लगाया।

धन्य है वे संत जो अपने साथ आने वाले सभी लोंगों को परमात्मा की ओर लगा देते है। ऐेसे संतो के चरणों में हमारा कोटि केाटि नमन है।

⚘ जय श्री राधे  ⚘


(साभार - श्री हरि मंदिर वृन्दावन)

Thursday, 19 March 2020

प्रकृति का संविधान l

महाभारत का एक सार्थक प्रसंग जो अंतर्मन को छूता है !

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी !  

गिद्ध , कुत्ते , सियारों की उदास और डरावनी आवाजों के बीच उस निर्जन हो चुकी उस भूमि में द्वापर का सबसे महान योद्धा "देवव्रत" (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था -- अकेला !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची , "प्रणाम पितामह" !

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी ,  बोले , " आओ देवकीनंदन !  स्वागत है तुम्हारा !!  

मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था" !!

कृष्ण बोले ,  "क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप" !

भीष्म चुप रहे , कुछ क्षण बाद बोले," पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव ?  
उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है" !

कृष्ण चुप रहे !

भीष्म ने पुनः कहा , "कुछ पूछूँ केशव  ?  
बड़े अच्छे समय से आये हो !  
सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय " !!

कृष्ण बोले - कहिये न पितामह ! 

एक बात बताओ प्रभु !  तुम तो ईश्वर हो न ?

कृष्ण ने बीच में ही टोका ,  "नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह , ईश्वर नहीं "

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा के हँस पड़े !  बोले , " अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण , सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा , पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया , अब तो ठगना छोड़ दे रे !! "

कृष्ण जाने क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले . " कहिये पितामह !"

भीष्म बोले , "एक बात बताओ कन्हैया !  इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या  ?"

"किसकी ओर से पितामह ?  पांडवों की ओर से  ?"

" कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया !  पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था ?  आचार्य द्रोण का वध , दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार , दुःशासन की छाती का चीरा जाना , जयद्रथ के साथ हुआ छल , निहत्थे कर्ण का वध , सब ठीक था क्या  ?  यह सब उचित था क्या ?"

इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह  !  
इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया  !!  
उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम , उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन !! 

 मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह  !!

"अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण ?
अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है , पर मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है  !  
मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण !"

"तो सुनिए पितामह  !  
कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ  ! 
वही हुआ जो हो होना चाहिए !"

"यह तुम कह रहे हो केशव ?  
मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है ?  यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ? "

"इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह , पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है ! 

हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है  !! 
राम त्रेता युग के नायक थे , मेरे भाग में द्वापर आया था !  
हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह  !!"

" नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो  !"

राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह !  
राम के युग में खलनायक भी ' रावण ' जैसा शिवभक्त होता था !!  
तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे !  
तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे !  
उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था !!
इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया ! 

किंतु मेरे युग के भाग में में कंस , जरासन्ध , दुर्योधन , दुःशासन , शकुनी , जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं  !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह , वह चाहे जिस विधि से हो !!

तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव ?  
क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा ?  
और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ??

भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह  !  

कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा  !
वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा ... नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा  !  

जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ  सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों,  तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह !  

तब महत्वपूर्ण होती है विजय , केवल विजय  ! 

 भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह  !!

क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव  ? 
और यदि धर्म का नाश होना ही है , तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ?

सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह  ! 
ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ..... !केवल मार्ग दर्शन करता है
सब मनुष्य को ही स्वयं  करना पड़ता है ! 

आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न  !  

तो बताइए न पितामह , मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ?  
सब पांडवों को ही करना पड़ा न ? 
यही प्रकृति का संविधान है !  
युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से ! यही परम सत्य है  !!

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे ! 
उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी  ! 
उन्होंने कहा - चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है .... कल सम्भवतः चले जाना हो ... अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण !

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले , पर युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था !

जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ  सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों, तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ।।


*🙏|| जय श्री कृष्ण: ||🙏


(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)

Monday, 16 March 2020

भगवान श्री राम जी जन्म कथा ।


भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।

भगवान श्री राम जी का जन्म कैसे हुआ ? रामचरितमानस अनुसार राम जन्म कथा -

भगवान राम ने कैसे अवतार लिया अथवा कैसे जन्म लिया ? कुछ लोग ऐसा सोचते है कि भगवान श्री रामचंद्र हमारे जैसे माँ के पेट से पैदा हुए और हमारे जैसे मानव (मनुष्य) थे। परन्तु वास्तविकता यह नहीं है।

भगवान श्री राम ने जन्म कैसे लिया इस बारे में तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में बहुत ही सुन्दर निरूपण किया है, हम वही राम जन्म की कथा को आपको बतायेगें। तुलसीदास जी श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड में लिखते है-

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥1॥

भावार्थ:- दीनों पर दया करने वाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरने वाले उनके अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर गई। नेत्रों को आनंद देने वाला मेघ के समान श्याम शरीर था, चारों भुजाओं में अपने (खास) आयुध (धारण किए हुए) थे, (दिव्य) आभूषण और वनमाला पहने थे, बड़े-बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभा के समुद्र तथा खर राक्षस को मारने वाले भगवान प्रकट हुए।

यहाँ पर ध्यान देने वाली बात है कि माँ कौसल्या जी के सामने चार भुजा धारण करके अस्त्र-शस्त्र लिए, दिव्य आभूषण और वनमाला पहने भगवान प्रकट हुए। अर्थात भगवान माँ के पेट से तो नहीं पैदा हुए, यह बात स्पष्ट हो गयी। क्योंकि माँ के पेट से अस्त्र-शस्त्र दिव्य आभूषण और वनमाला पहने कोई भी बच्चा नहीं आता। आगे और स्पष्ट तुलसीदास जी लिखते है -

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥2॥

भावार्थ:- दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी- हे अनंत ! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ। वेद और पुराण तुम को माया, गुण और ज्ञान से परे और परिमाण रहित (भगवान का निराकार स्वरूप) बतलाते हैं। श्रुतियाँ और संतजन दया और सुख का समुद्र, सब गुणों का धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तों पर प्रेम करने वाले लक्ष्मीपति भगवान मेरे कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं।

यहाँ पर तुलसीदास जी लिखते है कि लक्ष्मीपति भगवान प्रकट हुए। इसका मतलब की विष्णु जी प्रकट हुए चार भुजा धारण करके अस्त्र-शस्त्र लिए, दिव्य आभूषण और वनमाला पहने।

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥3॥

भावार्थ:- वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोम में माया के रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह (भरे) हैं। वे तुम मेरे गर्भ में रहे- इस हँसी की बात के सुनने पर धीर (विवेकी) पुरुषों की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती (विचलित हो जाती है)। जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुस्कुराए। वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं। अतः उन्होंने (पूर्व जन्म की) सुंदर कथा कहकर माता को समझाया, जिससे उन्हें पुत्र का (वात्सल्य) प्रेम प्राप्त हो (भगवान के प्रति पुत्र भाव हो जाए)

यहाँ पर राम की माँ कौसल्या जी कहती है कि जिसके रोम-रोम में माया के ब्रह्माण्डों के समूह है वो मेरे गर्भ में है यह हँसी की बात है। फिर जब माँ को भगवान ने कहा कि माँ आपने पूर्व जन्म में वर मांगा था। तो मैं आपके पुत्र के रूप में प्रकट हो गया हूँ। परन्तु माँ कौसल्या जी कहती है कि मैंने तो आपको पुत्र रूप में वर माँगा था आप तो मेरे पिता के रूप में आ गये।

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥4॥

भावार्थ:- माता की वह बुद्धि बदल गई, तब वह फिर बोली- हे तात ! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला करो, (मेरे लिए) यह सुख परम अनुपम होगा। (माता का) यह वचन सुनकर देवताओं के स्वामी सुजान भगवान ने बालक (रूप) होकर रोना शुरू कर दिया।

(तुलसीदासजी कहते हैं-) जो इस चरित्र का गान करते हैं, वे श्री हरि का पद पाते हैं और (फिर) संसार रूपी कूप में नहीं गिरते।

यहाँ पर और स्पष्ट हो जाता है कि भगवान पहले विष्णु रूप में प्रकट हुए फिर बाद में माँ कौसल्या के कहने पर भगवान विष्णु ने अपने आपको बालक रूप धारण कर के रोना शुरू कर दिया। अब यह स्पष्ट हो जाता है की भगवान राम माँ के पेट से नहीं पैदा हुए। भगवान विष्णु ने अपने आप को बालक (राम) स्वरूप बनाया और फिर रोना शुरू किया बालक की भाती।

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥

भावार्थ:- ब्राह्मण, गो, देवता और संतों के लिए भगवान ने मनुष्य का अवतार लिया। वे (अज्ञानमयी, मलिना) माया और उसके गुण (सत्‌, रज, तम) और (बाहरी तथा भीतरी) इन्द्रियों से परे हैं। उनका (दिव्य) शरीर अपनी इच्छा से ही बना है (किसी कर्म बंधन से परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा नहीं)

इसका मतलब की भगवान का शरीर माया और उसके गुण (सत्‌, रज, तम) से नहीं बना है।

मनुष्य का शरीर माया से पंचतत्व या पंचमहाभूत - पृथ्वी, पानी, आकाश, अग्नि और वायु से बनता है। और मनुष्य बनने का कारण है कर्म बंधन। परन्तु भगवान कर्म बंधन में नहीं बधे है अतएव तुलसीदास जी लिखते है की राम का शरीर यह माया से (किसी कर्म बंधन से परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा) नहीं बना है। भगवान का शरीर दिव्य है और भगवान अपनी इच्छा से ही अपना शरीर बनाते है।

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥

भावार्थ:- बच्चे के रोने की बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आईं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ दौड़ीं। सारे पुरवासी आनंद में मग्न हो गए।

।। जय श्री राम ।।

(Courtesy - Unknown WhatsApp forwarded message)