Thursday, 28 April 2022

"शरण्या" की व्याकुलता और कान्हा से मिलन”

 "शरण्या" की व्याकुलता और कान्हा से मिलन”

प्रथम भाग


दिन भर कान्हा के टैडी के साथ खेलना, उसके जैसी आवाज निकाल कर उनकी लीलाओं का घर में मंचन जब करती है तो पूरे घर को वृंदावन बना देती है वो। फिर उसकी लीला में हम दोनों नंद बाबा और यशोदा मैया स्वत: ही बन जाते हैं। श्रीदामा, मंशुका, श्रीधर, बलराम, मधुमंगल दूसरे टैडी बन जाते हैं। वो स्वयं बाल कृष्ण की दीदी है। 


यह जो मंचन है उसे वो हर पर जीती है। नाम उसका शरण्या है। शरण्या उसे कहते हैं जो भगवान के शरणागत है।


एकदिन गिरिराज परिक्रमा लगाने जाना हुआ तो वो इसलिए खुश थी कि वहाँ कृष्ण साक्षात मिलेंगे उसे। परिक्रमा में 12 किलोमीटर तक वह 4 साल की बच्ची केवल इसलिए पैदल चली है कि कहीं न कहीं कृष्ण से मुलाकात जरूर होगी।


अहा! कितना सुंदर भाव बालमन का। यही अंतर है बालक में और स्वयं को बडे समझने वालों में। तलहटी की परिक्रमा में श्रीनाथ जी का महल नुमा मंदिर पडा तो उसे देखकर बोली, पापा! शायद यही है कान्हा का घर। मुझे वहाँ ले चलो। वहाँ पहुंची तो भगवान के पट बंद थे। मंदिर में सफाई करते हुए लोगों से पूछा कि कान्हा जी सो रहे हैं? उन्होंने कहा," हां 5 बजे पट खुलेंगे।"


शरण्या थोडी निराश हुई। परिक्रमा में मेरे साथ आगे बढ तो गयी, पर निराशा का भाव चेहरे पर झलकने लगा। कहने लगी कि 5 बजे फिर से इसी जगह ले चलना पापा। मुझे कान्हा से मिलना है।


आगे बढती हुई परिक्रमा में मैं उसके इन प्रश्नों का उत्तर ठीक से दे ही नहीं पा रहा था। उसे किसी भी कीमत पर कान्हा से मिलना था और मैं असमंजस में था।


बचपन में मेरी मां कहा करतीं थीं कि गोवर्धन परिक्रमा में कान्हा परिक्रमा लगाने वालों को कहीं न कहीं किसी रूप में अवश्य दर्शन देते हैं। 


मुझे उनकी बात स्मरण हो आयी थी। मन ही मन कृष्ण से प्रार्थना की कि हे कृष्ण! तुम अंतर्यामी हो। बालक का विश्वास तुम्हारे प्रति दृढ़ है। बालक बडे होंगे तो पता नहीं कि बालक का मनोभाव कैसा हो!! इसलिए निश्छल निर्मल मन वाली शरण्या की तुम मनोकामना पूर्ण करो। कैसे भी दर्शन दो इसको।.. 


अब बारी कृष्ण की थी। भक्त ने तो अपनी व्यथा प्रकट कर ही दी है अब कृष्ण को आगे का काम करना है। आखिर तुमने ही तो गीता में वादा किया है ना.


"स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।।"


जो तुम्हारी तरफ थोड़ा सा भी कदम बढ़ा दे कोई तो तुम उसकी तरफ स्वयं चले आते हो। 


बडी परिक्रमा पूरी हो चुकी थी तो शरण्या गोद में सो गयी थी। थोडा आराम करने के बाद राधाकुंड में उसकी नींद खुल गयी। नींद खुलते ही उसने पूछा कि 5 बज गये क्या? मैंने कहा अभी 7 बज रहे हैं। उसने कहा पापा मुझे कान्हा जी से मिलना है। मैंने उसको समझाने को कहा कि इतनी देर से कान्हा जी ही तो तुझे उठाकर परिक्रमा में चल रहे थे। तुझे उन्होंने जगाया लेकिन तू जागी नहीं। फिर उन्होंने अपनी गोद में ले लिया तुझको। ऐसा सुनते ही उसके होठों पर मुस्कान आने लगी। उसके हावभाव बदल चुके थे। कान्हा के बारे में तरह तरह के प्रश्न करने लगी। पापा ये बताओ कि वो कितने साल के बनकर आये थे?


वो अकेले आये थे या अपने सखाओं (friends) के साथ? उसके प्रश्नों के जैसे समझ आये वैसे उत्तर देते परिक्रमा आगे बढती रही। तभी उसने कहा मुझे रिक्शे पर बैठना है। एक रिक्शेवाले को रोका तो शरण्या रिक्शे में बैठ गयी। उसने शरण्या का नाम पूछा तो शरण्या ने अपना नाम बताया। वो शरण्या को देखकर बहुत खुश था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि शरण्या को अपने रिक्शे में बिठाकर उसका आज का दिन सफल हो गया हो। मैंने अनायास ही उसका नाम पूछ लिया कि आपका नाम क्या है? रिक्शेवाले ने हंसते हुए उत्तर दिया कि मेरा नाम है "कान्हा" । और मैं शरण्या को रिक्शे पर ले चलने के लिए आया हूँ।


उसका उत्तर सुनते है मैं निशब्द हो गया। क्या अद्भुत लीला है प्रभु आपकी !


परिक्रमा में अक्सर रिक्शे वाले रिक्शे पर चढकर आगे बढते हैं। वो बची परिक्रमा में रिक्शे को पैदल खींचता रहा क्योंकि शरण्या से बात करता हुआ चल सके। शरण्या भी खूब बातें करती हुई चलती रही। उसे आनंद आ रहा था। 


दानघाटी पर परिक्रमा पूरी हुई तो शरण्या पर दुलार करके वो कुछ ही क्षणों में आंखों से ओझल हो गया। मैं निर्णय न कर सका कि वो कौन था!! बस विस्मय कर दिया था 'कान्हा' और उसके व्यवहार ने।


मैंने कान्हा को जो पुकार लगाई थी, शरण्या की उत्कंठा, मेरी माता जी का वह ध्रुव वाक्य कि " गोवर्धन परिक्रमा में कान्हा किसी न किसी रूप में दर्शन देते ही हैं ". ये सब बातें मन में घूमती रहीं। परिक्रमा के बाद शरण्या बहुत प्रशन्न थी। उसे साक्षात उसी रूप में दर्शन भले न हुए हों पर कृष्ण की उपस्थित का अहसास उसने अवश्य कर लिया था। 


द्वितीय भाग


फिर एक दिन वृंदावन जाना हुआ। शरण्या को लग रहा था कि कृष्ण मुझे गोवर्धन में नहीं मिले पर वृंदावन में जरुर मिल जाएंगे। बिहारी जी के दर्शन किए।  रंग मंदिर में उन दिनों ब्रह्मोत्सव चल रहा था। भगवान श्री विग्रह रूप में रथ की सवारी कर रहे हैं। विशाल मेला लगा हुआ हैं। रंग मंदिर की छटा ब्रह्मोत्सव में अनुपम थी। वृंदावन की परिक्रमा लगाई एवं श्री यमुना जी में नौका विहार किया। सब जगह शरण्या मेरे साथ होती। परन्तु उसकी उत्कंठा कृष्ण से साक्षात मिलने की थी। उसे विश्वास था कि वृंदावन में मुझे कृष्ण अवश्य मिलेंगे। वो बार बार पूछती जा रही थी कि पापा! कृष्ण कहां मिलेंगे। परिक्रमा मार्ग में दूर कहीं कुछ बालक गेंद खेलते हुए दिखाई दिए शरण्या ने कहा, पापा! शायद ये कृष्ण के सखा हैं एक बार इनसे ही पूछ लो ना!  मैं उसे बहलाता रहा।


परिक्रमा पूरी होने के बाद जब रंग मंदिर की तरफ हम आ रहे थे। तब तक शरण्या बहुत व्याकुल हो चुकी थी। अब उसने रास्ते में जोर से आवाज लगाना शुरू कर दिया।


ओ कान्हा......

राधा......

दाऊ भैया......


जब उसकी आवाज रास्ते में चलने वाले लोगों ने सुनी तो वे सब शरण्या को और उसकी व्याकुलता को अनुभव कर रहे थे।


अंततः शरण्या बहुत रोने लगी। तभी रंग मंदिर में सामने से आते हुए एक श्रीवैष्णवाचार्य के दर्शन हुए। उन्होंने रोते हुए बालक को देखकर ऐसे ही पूछ लिया कि क्या बात है बिटिया क्यों रो रही है?


तभी मैंने कहा कि स्वामीजी!  इसको कृष्ण से साक्षात मिलना है। बस इतना कहा, शरण्या पर उनका वात्सल्य बरस उठा। आचार्य ने शरण्या पर दुलार किया फिर कहा कि मैं कृष्ण से प्रार्थना करूंगा कि वे तुझे मिलने आयेंगे।


मेरे और शरण्या के गुरु जी एक ही हैं। शरण्या अपने गुरु जी के पास पहुंची तो स्वामीजी को प्रणाम किया। शरण्या को देखकर उनका ह्रदय भर आया।शरण्या शायद उनकी सबसे छोटी शिष्या है। अन्य शिष्य भी बैठे थे परन्तु शरण्या के प्रति उनकी स्नेहमयी कृपा सबसे अलग थी।


आखिर "गुरु कृपा" ही तो गोविंद से मिलने का मार्ग प्रशस्त करती है। यह पंक्ति ध्रुव सत्य है। शरण्या के परिपेक्ष्य में इसे अगले भाग में समझ जायेंगे। 


तृतीय भाग:- .. 


वृंदावन में कृष्ण से भेंट नहीं हो पायी। पर दिल्ली में उसकी व्याकुलता समाप्त नहीं हुई। 

मैं भी उसके दिन प्रतिदिन के उत्तर दे देकर अज्ञात भय से ग्रसित होने लगा था कि कहीं उसे ऐसा न लगने जाये कि कृष्ण कोई काल्पनिक हैं। तभी भगवान ने एक लीला की।


एक दिन हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में सुंदरकांड पाठ का आयोजन होने जा रहा था। आयोजक महोदय (गोपाल जी) आमंत्रण स्वरूप एक पुस्तिका देकर गये और कहकर गये कि 'शरण्या' को अवश्य लेकर आना। मैंने कहा ठीक है। जिस दिन कार्यक्रम होने वाला था मैं उधर जाने के लिए घर से निकला ही था कि दरवाजे के बाहर शरण्या आयी और मुस्कुरा कर मधुर वाणी में बोली, पापा ! सुंदरकांड में बच्चे नहीं जा सकते क्या? वह सुंदरकांड इसलिए जानती है कि हमारी सोसायटी में प्रत्येक शनिवार को सुंदरकांड पाठ होता है।


अचानक मुझे ध्यान आया कि आयोजक महोदय शरण्या के लिए कहकर गये थे। मैंने कहा कि तैयार हो जाओ चलते हैं। शरण्या तैयार होकर अपने आ गयी साथ चलने को। सुंदरकांड पाठ आरंभ हो चुका था मैं भी साथ साथ पढने लगा। यूं तो बालक चंचल होते हैं पर उस दिन शरण्या काफी समय तक एक स्थान पर बिना शरारत के बैठी रही। शायद इसलिए कि मैंने कहा था कि शोर मत करना। वहाँ पूजा है।


पाठ के बाद अचानक माइक पर घोषणा हुई कि

 

"श्रीराधा कृष्ण की झांकी का थोडी ही देर में दर्शन करें।" 


तभी कान्हा और राधा के मनमोहक वेष में उत्कृष्ट कलाकार मंच की ओर आने लगे। उनकी सजावट ऐसी कि उनको देखकर लगा मानो साक्षात राधा कृष्ण ही आये हों। शरण्या की दृष्टि कृष्ण बने हुए कलाकार की ओर ज्यों ही पडी। वह छवि का दर्शन पाकर शरण्या अब स्तब्ध और आनंदित हो गयी।


स्वयं को बडे समझने वालों के लिए भले वो एक कलाकार हों पर "शरण्या के लिए तो वे साक्षात कृष्ण ही थे।"

एकटक निहारती रही उनको। फिर उछलने लगी कि कान्हा आ गये! कान्हा आ गये।


वे जब स्टेज पर विराजमान हो गये तो वह मुझे बार बार याद दिलाने लगी कि 'कान्हा' आ गये हैं पापा।

मैंने उससे कहा कि जा उनसे मिलकर आ।


और वह नन्हें कदमों से थोडा सकुचाई हुई स्टेज की ओर चल दी। जहाँ राधाकृष्ण बिराजमान थे।


आखिर कृष्ण के बिल्कुल निकट पहुंच ही गयी। किसी ने उसको रोका नहीं। बिल्कुल कान्हा के निकट जाकर खडी हो गयी। कुछ देर बाद कान्हा की आंखें शरण्या से मिलीं तभी शरण्या ने गले मिलने के लिए जैसे ही दोनों हाथ बढाये कान्हा ने अपने ह्रदय से लगा लिया। और अपनी गोद में बिठा लिया। जब तक झांकी चलती रही वह कान्हा की गोद में बैठी रही। वह ह्रदय से आनंदित हो रही थी। वह क्षण शरण्या के लिए अद्भुत था। प्रतीक्षा का अंत हुआ था आज।


और इस तरह उसकी "साधना" सिद्धि में बदल चुकी थी। 


अब तीन भागों में लिखी इस कहानी के भाव को समझें। कहानी तो शरण्या और कान्हा की है। 

परन्तु इसमें निहितार्थ गहरा है। 

अहंकार नहीं बल्कि शरणागति (शरण्या) से ही कान्हा मिलते हैं।


प्रत्येक साधक की भी यही कहानी है। 


ईश्वर प्राप्ति के लिए भक्त में जब तक तीव्र उत्कंठा नहीं होगी तब तक वे उसे प्राप्त नहीं हो पायेंगे। यह पिपासा ही भगवद् दर्शन कराती है। हां वो मिलता है, जरूर मिलता है।


इसीलिए शायद उपनिषद भी यही उद्घोष करते हैं... 


"यमेवैष वृणुते तेन लभ्य:!!"


वो उसी को मिलता है जो उसकी ह्रदय से उसकी चाह रखता है। 



(साभार -  श्री कृष्ण भारद्वाज)


Sunday, 16 January 2022

"नानी बाई का मायरा"

 

🚩 "नानी बाई का मायरा" 🚩

नानी बाई ने (मायरा) भात भरने के लिए नरसी जी को बुलाया.

नरसी जी के पास भात भरने के लिए कुछ नहीं था.

वह निर्धन थे लेकिन भगवान की भक्ति का खजाना भरपूर था. 

वो कहते थे कि -हमें अपनी चिंता  क्यों करनी, हमारी चिंता करने के लिए भगवान बैठे हैं. 

जब नरसी जी के पास भात का सन्देश आया तो सामानों की लिस्ट देखकर चिंतित हो उठे और अंतर्मन से अपने भगवान को पुकारा -

“हे साँवरिया सेठ! हे गिरधारी !

नरसी मेहता को तो कोई नहीं जाने। तुमको जाने है दुनिया सारी,

नानी बाई की पुत्री थी सुलोचना बाई , सुलोचना बाई का विवाह जब तय हुआ था; तब नानी बाई के ससुराल वालों ने यह सोचा कि नरसी एक गरीब व्यक्ति है

तो वह शादी के लिये भात तो  भर नही पायेगा,

उनको लगा कि अगर वह साधुओं की टोली को लेकर पहुँचे तो हमारी बहुत बदनामी होगी, इसलिये उनको शादी में आने से रोकने के लिए उन्होंने भात के समान की एक बहुत लम्बी सूची बनाई !

उस सूची में करोड़ों का सामान लिख दिया गया जिससे कि नरसी उस सूची को देखकर खुद ही न आये।

नरसी जी को निमंत्रण भेजा गया !

साथ ही मायरा भरने की सूची भी भेजी गई ,

परन्तु नरसी के पास केवल एक चीज़ थी - वह थी श्री कृष्ण की भक्ति,

इसलिये वे उन पर भरोसा करते हुए अपने संतों की टोली के साथ सुलोचना बाई को आर्शिवाद देने के लिये अंजार नगर पहुँच गये,

उन्हें आया देख नानी बाई के ससुराल वाले भड़क गये और उनका अपमान करने लगे,

अपने इस अपमान से नरसी जी व्यथित हो गये और रोते हुए श्री कृष्ण को याद करने लगे, 

नानी बाई भी अपने पिता के इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाई और आत्महत्या करने दौड़ पड़ी !

परन्तु श्री कृष्ण ने नानी बाई को रोक दिया और उसे यह कहा कि कल वह स्वयं नरसी भक्त के साथ मायरा भरने के लिये आयेंगे।

दूसरे दिन नानी बाई बड़ी ही उत्सुकता के साथ श्री कृष्ण और नरसी जी का इंतज़ार करने लगी! और तभी सामने देखती है कि नरसी जी संतों की टोली और 

एक सेठजी जी के साथ चले आ रहे हैं और उनके पीछे ऊँटों और घोड़ों की लम्बी कतार आ रही है जिनमें सामान लदा हुआ है,

दूर दूर तक बैलगाड़ियाँ ही बैलगाड़ियाँ नज़र आ रही थी,ऐसा मायरा न अभी तक किसी ने देखा था न ही देखेगा!

यह सब देखकर ससुराल वाले अपने किये पर पछताने लगे,

उनके लोभ को भरने के लिये द्वारिकाधीश ने बारह घण्टे तक स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा की नानी बाई के ससुराल वाले

उस सेठ को देखते ही रहे और सोचने लगे कि ये सेठ कौन है

और ये नरसी जी की मदद क्यों कर रहा है, जब उनसे रहा न गया तो उन्होंने पूछा कि कृपा करके अपना परिचय दीजिये और आप नरसी जी की सहायता क्यों कर रहे हैं।​

उनके इस प्रश्न के उत्तर में जो जवाब सेठ ने दिया, वही इस कथा का सम्पूर्ण सार है !

तथा इस प्रसंग का केन्द्र भी है,इस उत्तर के बाद सारे प्रश्न अपने आप ही समाप्त हो जाते हैं, 

सेठ जी का उत्तर था ...

’मैं नरसी जी का सेवक हूँ !

इनका अधिकार चलता है मुझपर !

जब कभी भी ये मुझे पुकारते हैं ,

मैं दौड़ा चला आता हूँ इनके पास, !

जो ये चाहते हैं; मैं वही करता हूँ !

इनके कहे कार्य को पूर्ण करना ही मेरा कर्तव्य है।"

ये उत्तर सुनकर सभी हैरान रह गये और किसी के समझ में कुछ नहीं आ रहा था !

बस नानी बाई ही समझती थी कि उसके पिता की भक्ति के कारण ही श्री कृष्ण उससे बंध गये हैं ,और उनका दुख अब देख नहीं पा रहे हैं

इसलिये मायरा भरने के लिये स्वयं ही आ गये हैं, इससे यही साबित होता है कि भगवान केवल अपने भक्तों के वश में होते हैं।

जय हो साँवलिया सेठ की!!

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🙏जय श्री राम ~ जय श्री कृष्णा🙏

Tuesday, 9 November 2021

जब भगवान रात में राशन खरीदने आए...


 


।। भक्त चरित्र ।। 


श्री अयोध्या जी में 'कनक भवन' एवं 'हनुमानगढ़ी' के बीच में एक आश्रम है । जिसे 'बड़ी जगह' अथवा  'दशरथ महल' के नाम से जाना जाता है। 


काफी पहले वहाँ एक सन्त रहा करते थे । जिनका नाम था  श्री रामप्रसाद जी। 


उस समय अयोध्या जी में इतनी भीड़ भाड़ नहीं होती थी।  ज्यादा लोग नहीं आते थे। 


श्री रामप्रसाद जी ही उस समय बड़ी जगह के कर्ता धर्ता थे। 

वहाँ बड़ी जगह में मन्दिर है 

जिसमें पत्नियों सहित चारों भाई (श्री राम, श्री लक्ष्मण, श्री भरत एवं श्री शत्रुघ्न जी) एवं हनुमान जी की सेवा होती है। 


चूँकि सब के सब फक्कड़ सन्त थे .... तो नित्य मन्दिर में जो भी थोड़ा बहुत चढ़ावा आता था उसी से मन्दिर एवं आश्रम का खर्च चला करता था। 


प्रतिदिन मन्दिर में आने वाला सारा चढ़ावा एक बनिए को ( जिसका नाम था पलटू बनिया ) भिजवाया जाता था। 


उसी धन से थोड़ा बहुत जो भी राशन आता था.... उसी का भोग-प्रसाद बनकर भगवान को भोग लगता था और 

जो भी सन्त आश्रम में रहते थे वे खाते थे।


एक बार प्रभु की ऐसी लीला हुई कि मन्दिर में कुछ चढ़ावा आया ही नहीं। अब इन साधुओं के पास कुछ जोड़ा गाँठा तो था नहीं... तो क्या किया जाए ..? 


कोई उपाय ना देखकर श्री रामप्रसाद जी ने दो साधुओं को पलटू बनिया के पास भेज के कहलवाया कि 


भइया आज तो कुछ चढ़ावा आया नहीं है... 

अतः थोड़ा सा राशन उधार दे दो... 

कम से कम भगवान को भोग तो लग ही जाए। 


पलटू बनिया ने जब यह सुना तो उसने यह कहकर मना कर दिया कि मेरा और महन्त जी का लेना देना तो नकद का है... 

मैं उधार में कुछ नहीं दे पाऊँगा। 


श्री रामप्रसाद जी को जब यह पता चला तो 

"जैसी भगवान की इच्छा" 

कहकर उन्होंने भगवान को उस दिन जल का ही भोग लगा दिया। 


सारे साधु भी जल पी के रह गए। प्रभु की ऐसी परीक्षा थी की रात्रि में भी जल का ही भोग लगा और सारे साधु भी जल पीकर भूखे ही सोए।


वहाँ मन्दिर में नियम था कि शयन कराते समय भगवान को एक बड़ा सुन्दर पीताम्बर उढ़ाया जाता था तथा 

शयन आरती के बाद श्री रामप्रसाद जी नित्य करीब एक घण्टा बैठकर भगवान को भजन सुनाते थे। 


पूरे दिन के भूखे रामप्रसाद जी बैठे भजन गाते रहे और नियम पूरा करके सोने चले गए। धीरे-धीरे करके रात बीतने लगी। 


करीब आधी रात को पलटू बनिया के घर का दरवाजा किसी ने खटखटाया। वो बनिया घबरा गया कि इतनी रात को कौन आ गया। 


जब आवाज सुनी तो पता चला कुछ बच्चे दरवाजे पर शोर मचा रहे हैं- 

अरे पलटू... 

पलटू सेठ ... 

अरे दरवाजा खोल...। 


उसने हड़बड़ा कर खीझते हुए दरवाजा खोला। सोचा कि जरूर ये बच्चे शरारत कर रहे होंगे... 

अभी इनकी अच्छे से डाँट लगाउँगा। 


जब उसने दरवाजा खोला तो देखता है कि 


चार चार लड़के जिनकी अवस्था बारह वर्ष से भी कम की होगी .... 

एक पीताम्बर ओढ़ कर खड़े हैं। 

वे चारों लड़के एक ही पीताम्बर ओढ़े थे। 


उनकी छवि इतनी मोहक .... ऐसी लुभावनी थी कि ना चाहते हुए भी पलटू का सारा क्रोध प्रेम में परिवर्तित हो गया और वह आश्चर्य से पूछने लगा- 


बच्चों ...! 

तुम हो कौन और इतनी रात को क्यों शोर मचा रहे हो...? 


बिना कुछ कहे बच्चे घर में घुस आए और बोले हमें रामप्रसाद बाबा ने भेजा है। 


ये जो पीताम्बर हम ओढ़े हैं... इसका कोना खोलो... इसमें सोलह सौ रुपए हैं... निकालो और गिनो। 


ये वो समय था जब आना और पैसा चलता था। सोलह सौ उस समय बहुत बड़ी रकम हुआ करते थे। 


जल्दी-जल्दी पलटू ने उस पीताम्बर का कोना खोला तो उसमें सचमुच चाँदी के सोलह सौ सिक्के निकले। 


प्रश्न भरी दृष्टि से पलटू बनिया उन बच्चों को देखने लगा। तब बच्चों ने बताया इन पैसों का राशन कल सुबह आश्रम भिजवा देना। 


अब पलटू बनिया को थोड़ी शर्म आई कि हाय...! आज मैंने राशन नहीं दिया... लगता है महन्त जी नाराज हो गए हैं... इसीलिए रात में ही इतने सारे पैसे भिजवा दिए। 


पश्चाताप, सङ्कोच और प्रेम के साथ उसने हाँथ जोड़कर कहा- बच्चों..! मेरी पूरी दुकान भी उठा कर मैं महन्त जी को दे दूँगा ।तो भी ये पैसे ज्यादा ही बैठेंगे। इतने मूल्य का सामान देते देते तो मुझे पता नहीं कितना समय लग जाएगा। 


बच्चों ने कहा ठीक है... आप एक साथ मत दीजिए... थोड़ा-थोड़ा करके अब से नित्य ही सुबह-सुबह आश्रम भिजवा दिया कीजिएगा... 


आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना मत कीजिएगा। 

पलटू बनिया तो मारे शर्म के जमीन में गड़ा जाए । 


वो फिर हाँथ जोड़कर बोला- जैसी महन्त जी की आज्ञा। इतना कह सुन के वो बच्चे चले गए लेकिन जाते-जाते पलटू बनिया का मन भी ले गए। 


इधर सवेरे सवेरे मङ्गला आरती के लिए जब पुजारी जी ने मन्दिर के पट खोले तो देखा 


भगवान का पीताम्बर गायब है। 

उन्होंने ये बात रामप्रसाद जी को बताई और सबको लगा कि कोई रात में पीताम्बर चुरा के ले गया। 


जब थोड़ा दिन चढ़ा तो गाड़ी में ढेर सारा सामान लदवा के कृतज्ञता के साथ हाँथ जोड़े हुए पलटू बनिया आया और सीधा रामप्रसाद जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा। 


रामप्रसाद जी को तो कुछ पता ही नहीं था । 

वे पूछें- क्या हुआ... 

अरे किस बात की माफी माँग रहा है। 

पर पलटू बनिया उठे ही ना और कहे 

महाराज रात में पैसे भिजवाने की क्या आवश्यकता थी... 

मैं कान पकड़ता हूँ। 

आज के बाद कभी भी राशन के लिए मना नहीं करूँगा और  ये रहा आपका पीताम्बर... 


वो बच्चे मेरे यहाँ ही छोड़ गए थे.... बड़े प्यारे बच्चे थे... 

इतनी रात को बेचारे पैसे लेकर आ भी गये... 

आप बुरा ना मानें तो मैं एक बार उन बालकों को फिर से देखना चाहता हूँ।


जब रामप्रसाद जी ने वो पीताम्बर देखा तो पता चला ये तो हमारे मन्दिर का ही है जो गायब हो गया था। 


अब वो पूछें कि ये तुम्हारे पास कैसे आया ? तब उस बनिया ने रात वाली पूरी घटना सुनाई। 


अब तो रामप्रसाद जी भागे जल्दी से और सीधा मन्दिर जाकर भगवान के पैरों में पड़कर रोने लगे कि- 


हे भक्तवत्सल...! 

मेरे कारण आपको आधी रात में इतना कष्ट उठाना पड़ा और 


कष्ट उठाया सो उठाया मैंने जीवन भर आपकी सेवा की ..मुझे तो दर्शन ना हुआ ... 

और 

इस बनिए को आधी रात में दर्शन देने पहुँच गए । 


जब पलटू बनिया को पूरी बात पता चली तो उसका हृदय भी धक् से होके रह गया कि जिन्हें मैं साधारण बालक समझ बैठा । वे तो त्रिभुवन के नाथ थे... 

अरे मैं तो चरण भी न छू पाया। 

अब तो वे दोनों ही लोग बैठ कर रोए । 


ख़ैर इसके बाद कभी भी आश्रम में राशन की कमी नहीं हुई। आज तक वहाँ सन्त सेवा होती आ रही है। 


इस घटना के बाद ही पलटू बनिया को वैराग्य हो गया और यह पलटू बनिया ही बाद में श्री पलटूदास जी के नाम से विख्यात हुए। 


श्री रामप्रसाद जी की व्याकुलता उस दिन हर क्षण के साथ बढ़ती ही जाए और रात में शयन के समय जब वे भजन गाने बैठे तो मूर्छित होकर गिर गए। 


संसार के लिए तो वे मूर्छित थे 

किन्तु मूर्छावस्था में ही उन्हें पत्नियों सहित चारों भाइयों का दर्शन हुआ और 


उसी दर्शन में श्री जानकी जी ने उनके आँसू पोंछे तथा 

अपनी उँगली से इनके माथे पर बिन्दी लगाई ।


जिसे फिर सदैव इन्होंने अपने मस्तक पर धारण करके रखा। 


उसी के बाद से इनके आश्रम में बिन्दी वाले तिलक का प्रचलन हुआ। 


वास्तव में प्रभु चाहें तो ये अभाव... ये कष्ट भक्तों के जीवन में कभी ना आए परन्तु प्रभु जान बूझकर इन्हें भेजते हैं 

ताकि इन लीलाओं के माध्यम से ही जो अविश्वासी जीव हैं... वे सतर्क हो जाए्... 


उनके हृदय में विश्वास उत्पन्न हो सके। 

जैसे प्रभु ने आकर उनके कष्ट का निवारण किया ऐसे ही हमारा भी कर दें। 



श्री कृष्णार्पणमस्तु....


Thursday, 15 July 2021

श्री लक्ष्मण जी के पांच प्रश्न ।

 

पञ्चवटी में, वनवास के दौरान, लक्ष्मण जी ने राम जी से अपने मन में उठ रही जिज्ञासा को इन 5 प्रश्नों के रूप में पूछा था, जिसे अगर कोई अपने जीवन में अपना लें तो ये उसका जीवन, सत्य के स्वरूप को जान और समझकर, पूरी तरह बदल सकता है।

 

लक्ष्मण जी ने पंचवटी में भगवान राम जी से पूछा..

1- ज्ञान किसको कहते हैं?

2- वैराग्य किसको कहते हैं?

3- माया का स्वरूप बतलाइये?

4- भक्ति के साधन बताइये कि भक्ति कैसे प्राप्त हो?

5- जीव और ईश्वर में भेद बतलाइये?


भगवान श्री राम लक्ष्मण जी की बात सुनकर कहते हैं-


थोरेहि महं सब कहउं बुझाई।

सुनहु तात मति मन चित्त लाई।।


अर्थात - थोड़े में ही सब समझा देता हूं। यही विविधता है कि थोड़े में ही ज्यादा समझा देता हू्ं।


1- पहले भगवान ने माया वाला सवाल उठाया है क्योंकि पहले माया को जान लेना चाहिए। भगवान कहते हैं कि माया वैसे तो अनिर्वचनीय है लेकिन फिर भी -


मैं अरु मोर तोर तैं माया।

जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।


अर्थात - मैं, मेरा और तेरा - यही माया है, केवल छह शब्दों में बता दिया। मैं अर्थात् जब ''मैं'' आता है तो ''मेरा'' आता है और जहां ''मेरा'' होता है वहां ''तेरा'' भी होता है - तो ये भेद माया के कारण होता है।


माया के भी दो भेद बताये हैं- एक विद्या और दूसरी अविद्या।


एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा।

जा बस जीव परा भवकूपा।।

एक रचइ जग गुन बस जाकें।

प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।

अर्थात - अविद्या रूपी माया जीव को जन्म-मरण के चक्कर में फंसाती है, भटकता रहता है जीव जन्म अथवा मृत्यु के चक्कर में। और दूसरी विद्या रूपी माया मुक्त करवाती है।

2 - दूसरा प्रश्न - ज्ञान किसको कहते हैं?

अर्थात - हम ज्ञानी किसे कहेंगे ?, जो बहुत प्रकांड पंडित हो, शास्त्रों को जानता हो, बड़ा ही अच्छा प्रवचन कर सकता हो, दृष्टांत के साथ सिद्धांत को समझाये, संस्कृत तथा अन्य बहुत सी भाषाओं का जिसे ज्ञान हो वही ज्ञानी ! पंडित और ज्ञानी में अन्तर है, उसे पंडित कह सकते हैं लेकिन ज्ञानी नहीं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने बड़ी अद्भुत व्याख्या की है ज्ञानी की-

ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं।
देख ब्रह्म समान सब माहीं।।

अर्थात - ज्ञान उसको कहते हैं- जहां मान न हो अर्थात् जो मान - अपमान के द्वन्द्व से रहित हो और सबमें ही जो ब्रह्म को देखे। ज्ञान के द्वारा तो ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव हो जाता है तो सबमें भगवान को देखने लग जाता है।


3- तीसरा प्रश्न - वैरागी किसको कहेंगे?

अर्थात - हमारी परिभाषा यह है कि भगवें कपड़े पहने हो या फिर संसार छोड़ कर भाग गया हो, सिर पर जटायें हो, माथे पर तिलक हो, हाथ में माला लिए हुए हो - वैरागी !

भगवान श्री राम कहते हैं-

कहिअ तात सो परम बिरागी।
तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।

अर्थात - परम वैरागी वह है, जिसने सिद्धियों को तृन अर्थात् तिनके के समान तुच्छ समझा। कहने का तात्पर्य है कि जो सिद्धियों के चक्कर में नहीं फंसता और तीनि गुन त्यागी अर्थात् तीन गुण प्रकृति का रूप यह शरीर है - उससे जो ऊपर उठा अर्थात् शरीर में भी जिसकी आसक्ति नहीं रही- वही परम वैरागी है।

4- चौथा प्रश्न - जीव और ईश्वर में भेद-

माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।

अर्थात् जो माया को, ईश्वर को और स्वयं को नहीं जानता - वह जीव और जीव को उसके कर्मानुसार बंधन तथा मोक्ष देने वाला - ईश्वर।


5- पांचवां प्रश्न- भक्ति के साधन कौन से हैं, जिससे भक्ति प्राप्त हो जाए ?

भगवान श्री राम कहते हैं-


भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।

प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।

एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।।

श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाही। मम लीला रति अति मन माहीं।।

अर्थात - भक्ति के साधन बता रहा हूं, जिससे प्राणी मुझे बड़ी सरलता से पा लेता है। सबसे पहले विप्रों के चरण विपरें। विप्र का अर्थ है, जिसका जीवन विवेक प्रदान हो, ऐसे विप्रों के चरण विपरें। वेदों के बताये मार्ग पर चलें, अपने कर्तव्य-कर्म का पालन करें। इससे विषयों में वैराग्य होगा तथा वैराग्य उत्पन्न होने पर भगवान के (भागवत) धर्म में प्रेम होगा। तब श्रवणादिक नौ प्रकार की भक्तियां आ जाएंगी और भगवान की लीलाओं में प्रेम हो जाएगा।

संतों के चरणों में प्रेम हो, मन, कर्म और वचन से भगवान का भजन करे तथा गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सबमें मुझे ही देखे, सबको वंदन करे, सबकी सेवा करे - इतना कर ले, तो समझो मिल गयी भक्ति ! 

अब भक्ति मिली है या नहीं, इसका हमें कैसे पता चले ?
तो इसके लिये दो चौपाई और बतायी हैं-

मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।।

काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।

अर्थात - मेरे गुणों को गाते समय जिसका तन पुलकायमान हो उठे, शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से पानी बहने लगे - लेकिन केवल इतना ही काफी नहीं है। 

"काम आदि मद दंभ न जाकें"

जिसमें काम (विकार) न हो, मद (अहंकार) न हो और सबसे बड़ी बात दंभ (पाखंड) न हो- वही भक्त है। भगवान ऐसे भक्त के सदा वश में रहते हैं।

दोहा- बचन कर्म मन मोरि गति भजन करहिं नि:काम।
तिन्ह के हृदय कमल महुं करउँ सदा बिश्राम।।

आगे भगवान कहते हैं - जिसको मन, कर्म और वचन से मेरा ही आश्रय है तथा जो निष्काम भाव से मेरा भजन करता है, उसके हृदय में मैं सदा विश्राम करता हूं।

🙏 ।। जै श्रीराम ।। 🙏

Friday, 18 December 2020

श्री दुर्वासा मुनि द्वारा श्रीराधारानी को अमृतहस्ता वरदान प्राप्ति लीला ।

Barsana Radha Rani Mandir

एक बार ऋषि दुर्वासा बरसाने आए ।

श्री राधारानी अपनी सखियों संग बाल क्रीड़ा में मग्न थी ।

छोटे छोटे बर्तनों में झूठ मूठ भोजन बनाकर इष्ट भगवान श्री कृष्ण  को भोग लगा रही थी ।

ऋषि को देखकर राधारानी और सखियाँ संस्कार वश बड़े प्रेम से उनका स्वागत की ।

उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया और बैठने को कहा ।

ऋषि दुर्वासा भोली भाली छोटी छोटी कन्यायों के प्रेम से बड़े प्रसन्न हुए और  उन्होंने जो आसान बिछाया था उसमें बैठ गए ।

जिन ऋषि की सेवा में त्रुटि के भय से त्रिलोकी काँपती है,वही ऋषि दुर्वासा की सेवा राधारानी एवम सखियाँ भोलेपन से सहजता से कर रही हैं।ऋषि केवल उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे ।

सखियाँ कहतीं है  -

" महाराज !आपको पता है हमारी प्यारी राधा न बहुत अच्छे लड्डू बनाती है। हमने भोग अर्पण किया है। अभी आपको प्रसादी देती हैं । "

यह कहकर सखियाँ  लड्डू प्रसाद ले आती हैं । 

लड्डू प्रसाद तो है,पर है ब्रजरज का बना,खेल खेल में बनाया गया ।

ऋषि दुर्वासा उनके भोलेपन से अभिभूत हो जाते हैं। हँसकर कहते हैं -

" लाली!प्रसाद पा लूँ ?क्या ये तुमने बनाया है ? "

सारी सखियाँ कहती हैं -

"हाँ हाँ ऋषिवर ! ये राधा ने बनाया है। आज तक ऐसा लड्डू आपने नही खाया होगा "

मुंह मे डालते ही परम चकित,शब्द रहित हो जाते हैं ।

एक तो ब्रजरज का स्वाद,दूजा श्री राधा जी के हाथ का स्पर्श लड्डू ।

अमृत को फीका करे ऐसा स्वाद लड्डू का

ऋषि की आंखों में आंसू आ जाते हैं।अत्यंत प्रसन्न हो वो राधारानी को पास बुलाते हैं।

और बड़े प्रेम से उनके सिरपर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं -

" बेटी आज से तुम अमृत हस्ता हुई । तुम्हारे हाथ के बनाए भोजन को पानेवाला दीर्घायु और सदा विजयी होगा "

ऋषि दुर्वासा धन्य हैं जिनके आशीर्वाद ने श्री श्री राधा कृष्ण की अत्यंत मधुर्यमयी भावी लीला के लिए मार्ग प्रशस्त किया

🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🙏




 

Thursday, 26 November 2020

गोविंद को गायन में बसबोइ भावे ।

 


आगे गाय पाछें गाय इत गाय उत गाय, गोविंद को गायन में बसबोइ भावे।

गायन के संग धावें, गायन में सचु पावें, गायन की खुर रज अंग लपटावे॥

गायन सो ब्रज छायो, बैकुंठ बिसरायो, गायन के हेत गिरि कर ले उठावे।

'छीतस्वामी' गिरिधारी, विट्ठलेश वपुधारी, ग्वारिया को भेष धरें गायन में आवे॥

गौ चारण की सभी को  मंगलकामनाए

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Friday, 20 November 2020

श्रीकृष्ण कथा

 


एक बार कन्हैया को जिद्द चढ़ गई कि मैं अपना चित्र बनवाऊँगा ,
ये बात कान्हा ने मईया ते कही, मईया मै अपना चित्र बनवाऊँगो, 

मईया बोली चित्र बनवाय के का करेगो, 
कन्हैया बोले, मोय कछू ना पतो मैं तो बनवाऊँगो,

मईया कन्हैया को एक औरत के पास ले गई जिसका नाम था चित्रा, 
वो ऐसा चित्र बनाती थी कि कोई पहचान भी ना पावे था कि असली कौन है...

मईया कान्हा को चित्रा के पास ले कर गई और कहा कि कान्हा का चित्र बना दो,
चित्रा ने कान्हा को कभी देखा नही था
चित्रा ने जैसे ही कान्हा को देखा वो देखती ही रह गयी 
और मन मे सोचने लगी इतना प्यारा लल्ला और बहुत ही प्रेम मे खो गयी 

जब मैया ने चिकोटी काटी तब कही जाकर उसकी तन्द्रा भंग हुई ,
चित्रा ने कान्हा को सीधे खडे होने या बैठ जाने को कहा -
लेकिन कान्हा टेढे होने के कारण , बार-बार टेढे खडे हो जाते या बैठ जाते,
कान्हा बोले चित्र बनाना है 
तो ऐसे ही बनाओ.
मे तो एसो ही हूँ टेडो मेडो सो,

लेकिन जब चित्रा ने कान्हा की सूरत देखती तो उनकी शरारत आँखों मैं बस गयी
चित्रा का चित कान्हा मे ही कहीं खो गया

मईया कान्हा को ले कर चली गई और 
चित्रा से बोली चित्र बना कर कल हमारे घर दे जाना

लेकिन चित्रा जब भी कान्हा का चित्र बनाती तो रोने लग जाती 
और सारा चित्र खराब हो जाता

किसी तरह उसने चित्र बनाया और मईया के घर गई.
जब मईया ने चित्र देखा तो ,ख़ुशी के मारे झूम उठी और

चित्रा को वचन दिया की
इस चित्र के बदले तू जो माँगेगी मैं दुँगी चित्रा बोली सच मईया..

मईया बोली हाँ जो माँगेगी मैं दुँगी..
चित्रा बोली तो जिसका चित्र बनायो है वाको ही दे दिओ 

मईया ये बात सुन रोने लगी और 
बोली तू चाहे मेरे प्राण मांग ले पर कान्हा को नही....
चित्रा बोली मईया तू अपना वचन तोड़ रही है
मईया रोते हुए बोली तू कान्हा के समान कुछ भी माँग ले मैं दूँगी

चित्रा बोली तो कान्हा के समान जो भी वस्तु हो तुम मुझे दे दो...
मईया ने घर और बाहर बहुत देखा पर कान्हा के समान कुछ ना मिला..

इतने मे कान्हा चित्रा को थोङा कौने मे ले जा कर बोले 
देख तू मुझे ले जायेगी तो मेरी माँ मर जायेगी
चित्रा बोली अगर तू मुझे ना मिलो तो मै मर जाउँगी.

तब कान्हा ने चित्रा को समझाया की मे तो बृज मे आया ही इस ही लिए हूँ 
तू क्या जो भी मुझ को एक बार दिल से याद करेगा 
मैं खुद ही उसके सामने आ जाऊँगा मे सब
गोपियों का लाला हूँ और मेरी तो बहुत सारी मैया हैं 

तू भी तो मेरी मैया है ,और मैं अपनी मैया कू रोते नाय देख सकू
कान्हा की भोली भोली बातो मे चित्रा रीझ गयी
और बोली जब बुलाऊगी तब आयेगो न तब कान्हा बोले तेरी सो आऊंगा 

तब चित्रा खुश हो कर मईया से बोली अरी मईया मैं तो मजाक कर रही थी,
मुझे तेरा लाला नही चाहिये..ये सुन कर मईया की जान मे जान आई 

यहाँ गोपी का कृष्ण के प्रति अनुराग और 
मैया के कृष्ण प्रेम की लीला का अद्भुत और विलक्षण द्रश्य है,

हे कृष्णा.
भक्त्ति से अधिक आनंदित करने वाली
सृस्टि में कोई वस्तु नहीं है
जिसने एक बार इस सुख को पा लिया
वह सदा सदा केे लिए प्यासा हो गया
  
 🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🙏