Thursday, 15 July 2021

श्री लक्ष्मण जी के पांच प्रश्न ।

 

पञ्चवटी में, वनवास के दौरान, लक्ष्मण जी ने राम जी से अपने मन में उठ रही जिज्ञासा को इन 5 प्रश्नों के रूप में पूछा था, जिसे अगर कोई अपने जीवन में अपना लें तो ये उसका जीवन, सत्य के स्वरूप को जान और समझकर, पूरी तरह बदल सकता है।

 

लक्ष्मण जी ने पंचवटी में भगवान राम जी से पूछा..

1- ज्ञान किसको कहते हैं?

2- वैराग्य किसको कहते हैं?

3- माया का स्वरूप बतलाइये?

4- भक्ति के साधन बताइये कि भक्ति कैसे प्राप्त हो?

5- जीव और ईश्वर में भेद बतलाइये?


भगवान श्री राम लक्ष्मण जी की बात सुनकर कहते हैं-


थोरेहि महं सब कहउं बुझाई।

सुनहु तात मति मन चित्त लाई।।


अर्थात - थोड़े में ही सब समझा देता हूं। यही विविधता है कि थोड़े में ही ज्यादा समझा देता हू्ं।


1- पहले भगवान ने माया वाला सवाल उठाया है क्योंकि पहले माया को जान लेना चाहिए। भगवान कहते हैं कि माया वैसे तो अनिर्वचनीय है लेकिन फिर भी -


मैं अरु मोर तोर तैं माया।

जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।


अर्थात - मैं, मेरा और तेरा - यही माया है, केवल छह शब्दों में बता दिया। मैं अर्थात् जब ''मैं'' आता है तो ''मेरा'' आता है और जहां ''मेरा'' होता है वहां ''तेरा'' भी होता है - तो ये भेद माया के कारण होता है।


माया के भी दो भेद बताये हैं- एक विद्या और दूसरी अविद्या।


एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा।

जा बस जीव परा भवकूपा।।

एक रचइ जग गुन बस जाकें।

प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।

अर्थात - अविद्या रूपी माया जीव को जन्म-मरण के चक्कर में फंसाती है, भटकता रहता है जीव जन्म अथवा मृत्यु के चक्कर में। और दूसरी विद्या रूपी माया मुक्त करवाती है।

2 - दूसरा प्रश्न - ज्ञान किसको कहते हैं?

अर्थात - हम ज्ञानी किसे कहेंगे ?, जो बहुत प्रकांड पंडित हो, शास्त्रों को जानता हो, बड़ा ही अच्छा प्रवचन कर सकता हो, दृष्टांत के साथ सिद्धांत को समझाये, संस्कृत तथा अन्य बहुत सी भाषाओं का जिसे ज्ञान हो वही ज्ञानी ! पंडित और ज्ञानी में अन्तर है, उसे पंडित कह सकते हैं लेकिन ज्ञानी नहीं।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने बड़ी अद्भुत व्याख्या की है ज्ञानी की-

ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं।
देख ब्रह्म समान सब माहीं।।

अर्थात - ज्ञान उसको कहते हैं- जहां मान न हो अर्थात् जो मान - अपमान के द्वन्द्व से रहित हो और सबमें ही जो ब्रह्म को देखे। ज्ञान के द्वारा तो ईश्वर की सर्वव्यापकता का अनुभव हो जाता है तो सबमें भगवान को देखने लग जाता है।


3- तीसरा प्रश्न - वैरागी किसको कहेंगे?

अर्थात - हमारी परिभाषा यह है कि भगवें कपड़े पहने हो या फिर संसार छोड़ कर भाग गया हो, सिर पर जटायें हो, माथे पर तिलक हो, हाथ में माला लिए हुए हो - वैरागी !

भगवान श्री राम कहते हैं-

कहिअ तात सो परम बिरागी।
तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।

अर्थात - परम वैरागी वह है, जिसने सिद्धियों को तृन अर्थात् तिनके के समान तुच्छ समझा। कहने का तात्पर्य है कि जो सिद्धियों के चक्कर में नहीं फंसता और तीनि गुन त्यागी अर्थात् तीन गुण प्रकृति का रूप यह शरीर है - उससे जो ऊपर उठा अर्थात् शरीर में भी जिसकी आसक्ति नहीं रही- वही परम वैरागी है।

4- चौथा प्रश्न - जीव और ईश्वर में भेद-

माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव।
बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।

अर्थात् जो माया को, ईश्वर को और स्वयं को नहीं जानता - वह जीव और जीव को उसके कर्मानुसार बंधन तथा मोक्ष देने वाला - ईश्वर।


5- पांचवां प्रश्न- भक्ति के साधन कौन से हैं, जिससे भक्ति प्राप्त हो जाए ?

भगवान श्री राम कहते हैं-


भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।।

प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।

एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।।

श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाही। मम लीला रति अति मन माहीं।।

अर्थात - भक्ति के साधन बता रहा हूं, जिससे प्राणी मुझे बड़ी सरलता से पा लेता है। सबसे पहले विप्रों के चरण विपरें। विप्र का अर्थ है, जिसका जीवन विवेक प्रदान हो, ऐसे विप्रों के चरण विपरें। वेदों के बताये मार्ग पर चलें, अपने कर्तव्य-कर्म का पालन करें। इससे विषयों में वैराग्य होगा तथा वैराग्य उत्पन्न होने पर भगवान के (भागवत) धर्म में प्रेम होगा। तब श्रवणादिक नौ प्रकार की भक्तियां आ जाएंगी और भगवान की लीलाओं में प्रेम हो जाएगा।

संतों के चरणों में प्रेम हो, मन, कर्म और वचन से भगवान का भजन करे तथा गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सबमें मुझे ही देखे, सबको वंदन करे, सबकी सेवा करे - इतना कर ले, तो समझो मिल गयी भक्ति ! 

अब भक्ति मिली है या नहीं, इसका हमें कैसे पता चले ?
तो इसके लिये दो चौपाई और बतायी हैं-

मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।।

काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।

अर्थात - मेरे गुणों को गाते समय जिसका तन पुलकायमान हो उठे, शरीर पुलकित हो जाए, वाणी गदगद हो जाए और नेत्रों से पानी बहने लगे - लेकिन केवल इतना ही काफी नहीं है। 

"काम आदि मद दंभ न जाकें"

जिसमें काम (विकार) न हो, मद (अहंकार) न हो और सबसे बड़ी बात दंभ (पाखंड) न हो- वही भक्त है। भगवान ऐसे भक्त के सदा वश में रहते हैं।

दोहा- बचन कर्म मन मोरि गति भजन करहिं नि:काम।
तिन्ह के हृदय कमल महुं करउँ सदा बिश्राम।।

आगे भगवान कहते हैं - जिसको मन, कर्म और वचन से मेरा ही आश्रय है तथा जो निष्काम भाव से मेरा भजन करता है, उसके हृदय में मैं सदा विश्राम करता हूं।

🙏 ।। जै श्रीराम ।। 🙏

Friday, 18 December 2020

श्री दुर्वासा मुनि द्वारा श्रीराधारानी को अमृतहस्ता वरदान प्राप्ति लीला ।

Barsana Radha Rani Mandir

एक बार ऋषि दुर्वासा बरसाने आए ।

श्री राधारानी अपनी सखियों संग बाल क्रीड़ा में मग्न थी ।

छोटे छोटे बर्तनों में झूठ मूठ भोजन बनाकर इष्ट भगवान श्री कृष्ण  को भोग लगा रही थी ।

ऋषि को देखकर राधारानी और सखियाँ संस्कार वश बड़े प्रेम से उनका स्वागत की ।

उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया और बैठने को कहा ।

ऋषि दुर्वासा भोली भाली छोटी छोटी कन्यायों के प्रेम से बड़े प्रसन्न हुए और  उन्होंने जो आसान बिछाया था उसमें बैठ गए ।

जिन ऋषि की सेवा में त्रुटि के भय से त्रिलोकी काँपती है,वही ऋषि दुर्वासा की सेवा राधारानी एवम सखियाँ भोलेपन से सहजता से कर रही हैं।ऋषि केवल उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे ।

सखियाँ कहतीं है  -

" महाराज !आपको पता है हमारी प्यारी राधा न बहुत अच्छे लड्डू बनाती है। हमने भोग अर्पण किया है। अभी आपको प्रसादी देती हैं । "

यह कहकर सखियाँ  लड्डू प्रसाद ले आती हैं । 

लड्डू प्रसाद तो है,पर है ब्रजरज का बना,खेल खेल में बनाया गया ।

ऋषि दुर्वासा उनके भोलेपन से अभिभूत हो जाते हैं। हँसकर कहते हैं -

" लाली!प्रसाद पा लूँ ?क्या ये तुमने बनाया है ? "

सारी सखियाँ कहती हैं -

"हाँ हाँ ऋषिवर ! ये राधा ने बनाया है। आज तक ऐसा लड्डू आपने नही खाया होगा "

मुंह मे डालते ही परम चकित,शब्द रहित हो जाते हैं ।

एक तो ब्रजरज का स्वाद,दूजा श्री राधा जी के हाथ का स्पर्श लड्डू ।

अमृत को फीका करे ऐसा स्वाद लड्डू का

ऋषि की आंखों में आंसू आ जाते हैं।अत्यंत प्रसन्न हो वो राधारानी को पास बुलाते हैं।

और बड़े प्रेम से उनके सिरपर हाथ रखकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं -

" बेटी आज से तुम अमृत हस्ता हुई । तुम्हारे हाथ के बनाए भोजन को पानेवाला दीर्घायु और सदा विजयी होगा "

ऋषि दुर्वासा धन्य हैं जिनके आशीर्वाद ने श्री श्री राधा कृष्ण की अत्यंत मधुर्यमयी भावी लीला के लिए मार्ग प्रशस्त किया

🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🙏




 

Thursday, 26 November 2020

गोविंद को गायन में बसबोइ भावे ।

 


आगे गाय पाछें गाय इत गाय उत गाय, गोविंद को गायन में बसबोइ भावे।

गायन के संग धावें, गायन में सचु पावें, गायन की खुर रज अंग लपटावे॥

गायन सो ब्रज छायो, बैकुंठ बिसरायो, गायन के हेत गिरि कर ले उठावे।

'छीतस्वामी' गिरिधारी, विट्ठलेश वपुधारी, ग्वारिया को भेष धरें गायन में आवे॥

गौ चारण की सभी को  मंगलकामनाए

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Friday, 20 November 2020

श्रीकृष्ण कथा

 


एक बार कन्हैया को जिद्द चढ़ गई कि मैं अपना चित्र बनवाऊँगा ,
ये बात कान्हा ने मईया ते कही, मईया मै अपना चित्र बनवाऊँगो, 

मईया बोली चित्र बनवाय के का करेगो, 
कन्हैया बोले, मोय कछू ना पतो मैं तो बनवाऊँगो,

मईया कन्हैया को एक औरत के पास ले गई जिसका नाम था चित्रा, 
वो ऐसा चित्र बनाती थी कि कोई पहचान भी ना पावे था कि असली कौन है...

मईया कान्हा को चित्रा के पास ले कर गई और कहा कि कान्हा का चित्र बना दो,
चित्रा ने कान्हा को कभी देखा नही था
चित्रा ने जैसे ही कान्हा को देखा वो देखती ही रह गयी 
और मन मे सोचने लगी इतना प्यारा लल्ला और बहुत ही प्रेम मे खो गयी 

जब मैया ने चिकोटी काटी तब कही जाकर उसकी तन्द्रा भंग हुई ,
चित्रा ने कान्हा को सीधे खडे होने या बैठ जाने को कहा -
लेकिन कान्हा टेढे होने के कारण , बार-बार टेढे खडे हो जाते या बैठ जाते,
कान्हा बोले चित्र बनाना है 
तो ऐसे ही बनाओ.
मे तो एसो ही हूँ टेडो मेडो सो,

लेकिन जब चित्रा ने कान्हा की सूरत देखती तो उनकी शरारत आँखों मैं बस गयी
चित्रा का चित कान्हा मे ही कहीं खो गया

मईया कान्हा को ले कर चली गई और 
चित्रा से बोली चित्र बना कर कल हमारे घर दे जाना

लेकिन चित्रा जब भी कान्हा का चित्र बनाती तो रोने लग जाती 
और सारा चित्र खराब हो जाता

किसी तरह उसने चित्र बनाया और मईया के घर गई.
जब मईया ने चित्र देखा तो ,ख़ुशी के मारे झूम उठी और

चित्रा को वचन दिया की
इस चित्र के बदले तू जो माँगेगी मैं दुँगी चित्रा बोली सच मईया..

मईया बोली हाँ जो माँगेगी मैं दुँगी..
चित्रा बोली तो जिसका चित्र बनायो है वाको ही दे दिओ 

मईया ये बात सुन रोने लगी और 
बोली तू चाहे मेरे प्राण मांग ले पर कान्हा को नही....
चित्रा बोली मईया तू अपना वचन तोड़ रही है
मईया रोते हुए बोली तू कान्हा के समान कुछ भी माँग ले मैं दूँगी

चित्रा बोली तो कान्हा के समान जो भी वस्तु हो तुम मुझे दे दो...
मईया ने घर और बाहर बहुत देखा पर कान्हा के समान कुछ ना मिला..

इतने मे कान्हा चित्रा को थोङा कौने मे ले जा कर बोले 
देख तू मुझे ले जायेगी तो मेरी माँ मर जायेगी
चित्रा बोली अगर तू मुझे ना मिलो तो मै मर जाउँगी.

तब कान्हा ने चित्रा को समझाया की मे तो बृज मे आया ही इस ही लिए हूँ 
तू क्या जो भी मुझ को एक बार दिल से याद करेगा 
मैं खुद ही उसके सामने आ जाऊँगा मे सब
गोपियों का लाला हूँ और मेरी तो बहुत सारी मैया हैं 

तू भी तो मेरी मैया है ,और मैं अपनी मैया कू रोते नाय देख सकू
कान्हा की भोली भोली बातो मे चित्रा रीझ गयी
और बोली जब बुलाऊगी तब आयेगो न तब कान्हा बोले तेरी सो आऊंगा 

तब चित्रा खुश हो कर मईया से बोली अरी मईया मैं तो मजाक कर रही थी,
मुझे तेरा लाला नही चाहिये..ये सुन कर मईया की जान मे जान आई 

यहाँ गोपी का कृष्ण के प्रति अनुराग और 
मैया के कृष्ण प्रेम की लीला का अद्भुत और विलक्षण द्रश्य है,

हे कृष्णा.
भक्त्ति से अधिक आनंदित करने वाली
सृस्टि में कोई वस्तु नहीं है
जिसने एक बार इस सुख को पा लिया
वह सदा सदा केे लिए प्यासा हो गया
  
 🙏 जय श्री राधे कृष्णा 🙏

Friday, 11 September 2020

बिहारी जी का कंगन

बहुत समय पहले की बात है | वृन्दावन में श्रीबांके बिहारी जी के मंदिर में रोज पुजारी जी बड़े भाव से सेवा करते थे। 

वे रोज बिहारी जी की आरती करते, भोग लगाते और उन्हें शयन कराते और रोज चार लड्डू भगवान के बिस्तर के पास रख देते थे।

उनका यह भाव था कि, 

बिहारी जी को यदि रात में भूख लगेगी तो वे उठ कर खा लेंगे और जब वे सुबह मंदिर के पट खोलते थे तो भगवान के बिस्तर पर प्रसाद बिखरा मिलता था। इसी भाव से वे रोज ऐसा करते थे। 

एक दिन बिहारी जी को शयन कराने के बाद वे चार लड्डू रखना भूल गए। उन्होंने पट बंद किए और चले गए। 

रात में करीब १०-११ बजे, मंदिर के पास के जिस दुकान से वे बूंदी के लड्डू आते थे, उन बाबा की दुकान खुली थी। 

वे घर जाने ही वाले थे तभी एक छोटा सा बालक आया और बोला, 

बाबा मुझे बूंदी के चार लड्डू चाहिए। 

बाबा ने कहा - 

लाला, बूँदी के लड्डू तो खत्म हो गए, बाकी के अभी बचे हैँ। 

तब बालक मना करते हुए बोला - 

नहीँ बाबा मुझे तो बूँदी के ही लड्डू चाहिए आप अंदर देख लीजिए कुछ बूँदी के लड्डू मिल जाऐँगे। 

अंदर गये तो केवल चार बूँदी के लड्डू अब भी बचे थे। तो देते हुए बोले, 

लाला तुम बहुत भाग्यशाली हो तुम्हारे लिए बूँदी के लड्डू मिल ही गये। 

छोटे छोटे हाथोँ मेँ लड्डू देते हुए बाबा ने कहा - 

पैसे दो।

बालक ने कहा - 

मेरे पास पैसे तो नहीं हैं परंतु, ये सोने का कंगन है आप ये ले लीजिए और कल सुबह मेरे बाबा जी पैसे दे जाऐँगे तब आप ये कंगन वापस कर दीजिएगा। 

बाबा देखते ही रह गये की, 

कितना प्यारा बालक है किसी ब्राह्मण का पुत्र है ये लड्डू चार पैसे का भी नहीँ और सोने का इतना मँहगा कंगन दिये दे रहा है। 

तो बाबा ने कहा - 

लाला पैसे नहीं हैं तो रहने दो, कल अपने बाबा से कह देना, मैं उनसे ले लूँगा। 

पर वह बालक नहीं माना और कंगन दुकान में फेँक कर भाग गया। 

सुबह जब पुजारी जी ने पट खोला तो उन्होंने देखा कि, बिहारी जी के हाथ में कंगन नहीं है। मंदिर मेँ चोरी हो गयी है। 

थोड़ी देर बाद ये बात सारे मंदिर में फ़ैल गई। सभी उदास थे की बाँकेबिहारी जी का कंगन चोरी हो गया।

मंदिर का पुजारी उस लड्डू की दुकान के पास से गुजरा। तो दुकान बाले बाबा ने पूछा की, 

क्या बात है पुजारी जी ? आज आप बहुत उदास दिख रहे हैँ और आपने आज जय श्रीराधे भी नहीँ बोला। 

पुजारी जी बोले मंदिर मेँ चोरी हो गयी है बाँकेबिहारी जी का कंगन चोरी हो गया है। 

तब उस दुकान वाले को रात की बात याद आई उसने सारी बात बताई की, 

कल रात एक तेजस्वी बालक अपना कंगन दे गया है लड्डू के बदले। 

फिर वो कंगन लाकर पंडित जी को दिया। 

पंडितजी, 

"मिल गया मिल गया बाँकेबिहारी जी का कंगन" कहते मंदिर की तरफ दौडे। 

तब मंदिर के पुजारी जी बोले, 

कल रात बाँकेबिहारी जी के पास लड्डू रखना भूल गया था तो बाँकेबिहारी जी खुद ही लड्डू ले आये। 

ये सब जानकर लड्डूबाले बाबा बोले, 

कल रात स्वयं बाँके बिहारी जी आये थे और मै पहचान न सका। 

फिर वो भगवान की भक्ति मेँ ही लीन रहने लगे।

जय श्री कुंज बिहारी👏👏

Wednesday, 12 August 2020

'संकटमोचन' श्री हनुमान ।


इस मानवरूपी जीवनकाल में अक्सर इंसान खुद को विपरीत परिस्थ‍ितियों के बीच घि‍रा पाता है। मुसीबतों से पार पाने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। जब सारे उपाय नाकाम हो जाते हैं, तो हारकर प्रभु की शरण में आता है।

प्रभु भी अपनी शरण में आए हुए को कभी निराश नहीं करते। जिस तरह मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम दीनों पर दया करने वाले, कृपा के सागर हैं, उसी तरह उनके भक्त हनुमान भी शरण में आए भक्तों पर अपना स्नेह दिखलाते हैं। संकटों से उबारने की वजह से ही तो उन्हें 'संकटमोचन' नाम मिला है।

रामचरितमानस के किष्किंधाकांड की इन चौपाइयों में आपको सकारात्मकता का अविरल उदाहरण मिलता है। कहा जाता है कि इस अंश का पाठ करने से हनुमान जी अपने भक्तों पर असीम प्रेम बरसाते हैं।

यह वही प्रसंग है, जब सीता माता की खोज में समुद्र के पार लंका भेजे जाने के लिए जामवंत हनुमानजी को उनके असीम-अपार बल का स्मरण कराते हैं ।इसके पाठ से बड़ी से बड़ी बाधाएं दूर होती हैं और सभी मनोरथ सिद्ध होते हैं...

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥

पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥


भावार्थ:-ऋक्षराज जाम्बवान् ने श्री हनुमानजी से कहा - हे हनुमान्! हे बलवान्! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है ? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥


कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥

राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

भावार्थ:- जगत् में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्री रामजी के कार्य के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्जी पर्वत के आकार के (अत्यंत विशालकाय) हो गए॥

कनक बरन तन तेज बिराजा। मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥

सिंहनाद करि बारहिं बारा। लीलहिं नाघउँ जलनिधि खारा॥


भावार्थ:-उनका सोने का सा रंग है, शरीर पर तेज सुशोभित है, मानो दूसरा पर्वतों का राजा सुमेरु हो। हनुमान्जी ने बार-बार सिंहनाद करके कहा - मैं इस खारे समुद्र को खेल में ही लाँघ सकता हूँ॥


सहित सहाय रावनहि मारी। आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥

जामवंत मैं पूँछउँ तोही। उचित सिखावनु दीजहु मोही॥


भावार्थ:- और सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर यहाँ ला सकता हूँ। हे जाम्बवान् ! मैं तुमसे पूछता हूँ, तुम मुझे उचित सीख देना (कि मुझे क्या करना चाहिए)॥


एतना करहु तात तुम्ह जाई। सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥

तब निज भुज बल राजिवनैना। कौतुक लागि संग कपि सेना॥


भावार्थ:-(जाम्बवान् ने कहा-) हे तात ! तुम जाकर इतना ही करो कि सीताजी को देखकर लौट आओ और उनकी खबर कह दो। फिर कमलनयन श्री रामजी अपने बाहुबल से ही राक्षसों का संहार कर सीताजी को ले आएँगे, केवल खेल के लिए ही वे वानरों की सेना साथ लेंगे॥


छंद :

कपि सेन संग सँघारि निसिचर रामु सीतहि आनि हैं।

त्रैलोक पावन सुजसु सुर मुनि नारदादि बखानि हैं॥

जो सुनत गावत कहत समुक्षत परमपद नर पावई।

रघुबीर पद पाथोज मधुकर दास तुलसी गावई॥


भावार्थ:- वानरों की सेना साथ लेकर राक्षसों का संहार करके श्री रामजी सीताजी को ले आएँगे। तब देवता और नारदादि मुनि भगवान् के तीनों लोकों को पवित्र करने वाले सुंदर यश का बखान करेंगे, जिसे सुनने, गाने, कहने और समझने से मनुष्य परमपद पाते हैं और जिसे श्री रघुवीर के चरणकमल का मधुकर (भ्रमर) तुलसीदास गाता है।


दोहा :

भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।

तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥


भावार्थ:-श्री रघुवीर का यश भव (जन्म-मरण) रूपी रोग की (अचूक) दवा है। जो पुरुष और स्त्री इसे सुनेंगे, त्रिशिरा के शत्रु श्री रामजी उनके सब मनोरथों को सिद्ध करेंगे॥


सोरठा :

नीलोत्पल तन स्याम काम कोटि सोभा अधिक।

सुनिअ तासु गुन ग्राम जासु नाम अघ खग बधिक॥


भावार्थ:-जिनका नीले कमल के समान श्याम शरीर है, जिनकी शोभा करोड़ों कामदेवों से भी अधिक है और जिनका नाम पापरूपी पक्षियों को मारने के लिए बधिक (व्याधा) के समान है, उन श्री राम के गुणों के समूह (लीला) को अवश्य सुनना चाहिए॥


🚩जय श्रीराम🚩

🚩जय बजरंग बली 🚩


(साभार - श्री कृष्ण भारद्वाज)


Thursday, 16 July 2020

भगवान कृष्ण की बाललीला ।



भगवान कृष्ण की बाललीला का एक दृष्टांत!!!

मैया कन्हैया को घर के अन्दर ले गयीं और बोली- क्यों रे लाला तने बाबा के पूजा घर में से भगवान् मुंह में धर लिये, कन्हैया बोले- मैया, वो रोज घी में नहाते है, शहद में नहाते है ना, इसलिये मैंने सोचा मीठे होंगे तो मैंने मुंह में धर लिये, मैया बोली- लाला अब ऐसा मत करना वरना कान पकड़ के मारूंगी।

ऐसो ऊधम मचावे, अब तू इतनौ छोटौ थोड़े ही है, मैया नै लाला को स्नान करायौ और बोली, स्नान करके भगवान् की पूजा में जाना चाहिये, बिना स्नान किये भीतर नहीं जाते, स्नान कराके पीताम्बर पहनायौ, आज लाला की कमर में करधनी बांधी, चरणों में नुपुर बांध दिये, मोर पंख माथे पर बांध्यो, जैसे ही नूपुर बांधे, मैया अंगुली पकड़कर लाला को चलाने लगी तो ये तो ठुमका मारकर नाचने लगे।

मैया बोली- हे भगवान् ये नाचना कब सीख लिया, लाला की मैया ताली बजाने लगी और भूल गयी, सब कुछ विस्मृत हो गयी, मैया बहुत प्रसन्न है, "नाचे नंदलाला नचावें हरि की मैया, यशोदा तेरे भाग की कही न जाय" 

आप जरा देखो सज्जनों- साक्षात् परब्रह्म, "जग जाकी गोद में, सो यशोदा की गोद में" दुनियां जिसके इशारे पर नाचती है, वो यशोदा के इशारे पर नाच रहा है- भाईयों ! थोड़े से छाछ व मक्खन के लिए गोपियां भगवान को नचां देती थी।

आपका ह्रदय ही सुंदर मंदिर है, ह्रदय रूपी मंदिर में परब्रह्म को नचाइयें, भाव से गायेंगे तो नाचेगा, यशोदाजी के भाव का दर्शन करें- लाला को कोई चीज अच्छी नहीं लगती, मैया कभी दुशाला ओढ़तीं है, गोविन्द नहीं ओढ़तें, क्यों ? क्योंकि उन्हें तो कारी कमरिया ही अच्छी लगती हैं, ऐसा सुन्दर गोपाल नृत्य करते हैं।

शेष, महेश, गणेश, दिनेश, सुरेश हुं जाहि निरन्तर ध्यावैं।
ताहि अखण्ड अनन्त अनादि अछेध, अवैध सुवेद बतावै।।
नारद से शुक व्यास रळें पचिहारि कोउ पुनि पार न पावै।
ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै।।

कृष्ण चरित्र में जो यश प्रदान करे उसे यशोदा कहते हैं, एक और बात- राधारानी की माता का नाम क्या है ? कीर्ति, और कृष्ण की माता का नाम है यशोदा, यदि आप व्याकरण के हिसाब से उसका शाब्दिक अर्थ देखें तो "कीर्तिः ददति इति कीर्तिदा" और "यशं ददति इति यशोदा" जो कीर्ति दे वो कीर्तिदा और जो यश देवे वो यशोदा, यश यानी कीर्ति और कीर्ति यानी यश।

राधा और कृष्ण दोनों की माताओं के नाम का अर्थ एक ही होता है, यदि लाला की लीलाओं में यशोदा यश प्रदान न करे तो गोविन्द को कौन जाने, गोविन्द को कौन पहचाने ? ऐसा सुन्दर चरित्र है कृष्ण का, मैया जब नृत्य करा रही लाला को, दो ढाई वर्ष के कृष्ण है, रूनक-झुनक पायल बज रही, आज एक गोपी ने गोविन्द को नृत्य करते हुए देख लिया।

उस गोपी का नाम है श्रुतिरूपा, वेद के मंत्र गोपी बनकर आऐं है, गोपी का मन रूपी मयूर नाचने लगा, दौड़ी-दौड़ी गोपियों की मण्डली में गयीं, गोपियां बोली- क्या बात है ? क्यों इतनी खुश हो रही हो ? गोपी बोली- मैंने आज विचित्र दृश्य देखा, आश्चर्य देखा, गोपियां बोली, क्या देखा ? बोली, गाय की धूल से धूसरित अंग वाला, वेदांत प्रतिपाध ब्रह्म आज यशोदा के आंगन में नाच रहा था।

श्रृणुसखि कौतुकमेकं नन्द निकेतांगणेमयादृष्टं।
गोधूलि धूसरितांगः नृत्यति वेदान्त सिद्धान्त।।

इस बात को सुनकर हजारों गोपियों के नैत्र नम हो गये और गोपियों ने मन में सोचा, हम गोविन्द का दर्शन कैसे करे ? यशोदा बड़ी भाग्यशाली है, जिसके आंगन में कृष्ण नाचता है, पर लाला का हम दर्शन कैसे करें ? अब सब विचार कर रही है, कैसे जायें दर्शन करने? सासूजी तो घर से जाने नहीं देती।

कोई-कोई सासूजी बड़ी खतरनाक होती है, स्वयं सब जगह चली जाती हैं, पर बहू को कहीं नहीं जाने देती, मैं तो हास्य-विनोद मैं कह रहा हूं, जो सास है वो बुरा न मानें।

देखे बिन कान्हा जब मन नाहिं माना,
इन आंखों से आज हमने ब्रह्म पहचाना है।
कृष्ण पद कमलों में मन को लगाना,
इन गोपियों का ताना ये उलाहना तो बहाना है।।

बहूओं ने सोचा कैसे भी कृष्ण का दर्शन करें, भले ही उलाहना के बहाने ही कृष्ण का दर्शन क्यों ना करना पड़े, कैसे करें ? सासूजी सवेरे गयीं शिव मंदिर शिवजी को जल चढ़ाने, नयी-नयी बहूओं ने घर की जितनी भी मटकीयां थी, सारी फोड़ दीं सासूजी आयीं - बहू, ये मटकी कैसी फूटी पड़ी है, बोली, माताजी ! नन्दजी के लाला आये और सारी मटकी फोड़कर चले गये।

सासूजी बोलो - अच्छा, वो नन्द के छोरा की इतनी हिम्मत की मेरे घर में आयकर मेरी मटकी फोड़कर चल्यो गयो, बहू, यदि मैं जाऊँगी तो बात ज्यादा बढ़ जायेगी, इसलिये तुम जाओ हमारी तरफ से यशोदा को उलाहना देकर आओ बड़ी खुशी की बात है, इस उलाहने के बहाने आज लाला के दर्शन तो हो जाऐंगे, इन गोपियों का ताना, ये उलाहना तो एक बहाना है।

🙏 ‼ वृन्दावन बिहारीलाल की जय ‼ 🙏

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